प्रेम-बिन बेरंग दुनिया
March 19, 2019"प्रेम-बिन बेरंग दुनिया" :चुनाव-रहित मन हो तो जिंदगी रंगीन बन जाती है। तितलियां हर फूल के मुख पर प्रेम से बैठती हैं और फूल अपना गंध-मधु- रंग सब कुछ लुटा कर भी हवाओं के संग डोल-डोल कर अपना आनंद प्रकट करता है-" फूल के मुख पर तितली को बिठाकर, चाहत का सलीका भी सिखाया जाए। मजहब नया कोई बनाया जाए, इंसान की अस्मत को बचाया जाए।।"- काश!यह इंसान किसी वन में शिक्षा ग्रहण करता तो किसी एक रंग की श्रेष्ठता का मंत्र न सीख पाता क्योंकि रंग-बिरंगी दुनिया उसे इतना मंत्रमुग्ध कर लेती कि वह किसी एक रंग का चुनाव ही न कर पाता। किंतु आज तो बचपन का वह गांव पूरा बदल गया है। किसी छत पर केसरिया रंग का ध्वज हवा में बड़ी शान के साथ लहरा रहा है तो दूसरे छत पर हरा रंग का ध्वज हवाओं से अठखेलियां कर रहा है। किसी छत पर लाल रंग का ध्वज दिखाई दे रहा है तो किसी पर नीला रंग का ध्वज अंगड़ाइयां ले रहा है। बहुत दिनों के बाद गांव में लौटे बचपन के इन दोस्तों को मालूम ही नहीं था कि गांव के लोग अब होली के लिए भी रंगों का चुनाव करते हैं। अब रंगो को चुनकर लगाना और किस रंग का कौन मुरीद हैं ,उसे पहचानना बहुत जटिल पहेली बन गया था। पहले तो सभी उम्र के और सभी बिरादरी के लोग ,सभी प्रकार के रंगों को लिए हुए एक दूसरे के दरवाजे पर पहुंच जाते थे और एक साथ गाते थे-" होली के दिन दिल खिल जाते हैं ,रंगों से रंग मिल जाते हैं"- सभी प्रकार के रंग में रंग कर इंद्रधनुष की मनमोहक छटा निर्मित कर जब एक साथ ढोल बजाते हुए लोग गंगा के घाट की ओर बढ़ते थे तो गंगा की लहरें भी इतनी रंग-बिरंगी हो जाती थी कि पूछने का मन होता था-" पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ?"- फिर दिल के किसी अज्ञात कोने से आवाज आती -"जिसमें मिला दे ,उसी रंग जैसा।।'- वह रंग प्रेम का है-" इस रंग में कोई जी ले अगर मरने का उसे गम क्या होगा ?-'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे होली की शुभकामनाओं के साथ🙏🌹