होलिका दहन के साथ दिल भी चुपचाप जल रहा था
March 20, 2019"होलिका दहन के साथ दिल भी चुपचाप जल रहा था": हरे पेड़ की मोटी-मोटी शाखों को काटकर बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ होलिका दहन की तैयारी की जा रही थी। हर मोहल्ले के मोड़ पर सौ- दो सौ मीटर की दूरी पर ही पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना के उपरांत जब आग की लपटें आसमान की ओर उठने लगीं और चारों तरफ धुएं का गुब्बार छाने लगा तो बुद्धि ने हृदय से पूछा -' माना तुम्हारी भावना बुराइयों की प्रतीक होलिका को जलाने की है किंतु क्या तुम जीवन के प्रतीक हरी शाखाओं को जलाकर पवन देव को प्रदूषित नहीं कर रहे हो? हृदय से आवाज आई कि हमारी परंपरा में होलिका दहन इसी प्रकार से होता आया है। बुद्धि ने तपाक से प्रश्न किया कि जिस जमाने में शुद्ध वायु के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की आवश्यकता महसूस की जाने लगी हो, उस समय में क्या इस परंपरा में समयानुकूल बदलाव उचित नहीं होगा? विवेक बीच में उतर आया और धीमी आवाज में कहने लगा की भावना के बहाव में जो हो रहा है वह उचित तो नहीं लगता किंतु भावना प्रधान परंपरावादी लोगों को पर्यावरण प्रदूषण का चैप्टर किताबों में खूब पढ़ाया गया लेकिन आचरण में कहां उतरा? तब से मैं भावना-बुद्धि-विवेक के वार्तालाप को सुनते हुए इन आंखों से धूएँ भरे आकाश को देख रहा हूं।-' शिष्य गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹