"कॉलेज शिक्षा में मासिक टेस्ट की योजना"आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है यदि शिक्षकों और विद्यार्थियों को पूर्णरूपेण इसी एकमात्र लक्ष्य हेतु चुनाव ड्यूटी के तर्ज पर नियोजित कर दिया जाए।"एक साधै,सब सधै; सब साधै, सब जाये। रहिमन मूलहिं सींचिबो ,फलहीं फूलहीं अघाय।।"- कॉलेज शिक्षा में मैं जब 1996 में आया था, तब पहली घंटी 8:00 बजे सुबह बजती थी और अंतिम घंटी 5:00 बजे शाम बजती थी। पहली से अंतिम घंटी तक विद्यार्थियों की अच्छी संख्या नियमित रूप से दिखती थी और शिक्षक पूर्णतया अध्ययन-अध्यापन में संलग्न दिखते थे। जनवरी माह में एक सप्ताह का साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था, जिसमें विद्यार्थियों की भागीदारी और प्रतिभा का प्रदर्शन बहुत ही सराहनीय होता था। जब से विभिन्न समितियों की गतिविधियां बढ़ती गईं और शैक्षिकेतर कार्यक्रम प्रमुखता से होने लगे और उनकीं रिपोर्ट भेजने का कार्य प्राथमिकता से किया जाने लगा तब से कॉलेज शिक्षालय से शनै:शनै:सूचनालय में परिवर्तित होता चला गया। कक्षाएं प्रभावित होने लगीं और विद्यार्थी नियमित कक्षाओं के अभाव में ट्यूशन और कोचिंग की ओर रुख करने लगे। ट्यूशन व्यवसाय पहले भी चलता था किंतु नियमित कक्षाओं के कारण अधिकतर विद्यार्थी अधिक से अधिक शिक्षकों का क्लास अटेंड करने को प्राथमिकता में रखते थे। यदि फिर से सह- शैक्षणिक गतिविधियों के लिए सत्र के अंत में एक सप्ताह का समय निर्धारित कर जुलाई के प्रथम सप्ताह से हीं कक्षाओं मेँ टॉपिक वाइज नियमित अध्यापन हो और माह के अंत में उसका टेस्ट लेने की व्यवस्था हो तो निश्चित ही विद्यार्थी क्लासेज की ओर लौट आएंगे। क्योंकि अधिकतर विद्यार्थियों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे सभी विषयों का ट्यूशन या कोचिंग ले पाएं। पाठ्यक्रम में प्रतियोगिता परीक्षा के अनुरूप परिवर्तन और विद्यार्थियों की क्लास में उपस्थिति अनिवार्य कर शिक्षकों को एकमात्र पढ़ाने के काम में ध्यान लगाने को बाध्य कर दिया जाए तो कॉलेज और युवा पीढ़ी के बीच खत्म होते रिश्ते फिर से पुराने दिनों के रिश्तों की तरह आत्मीय हो जाएंगे। प्रतियोगिता दक्षता कार्यक्रम हो अथवा मासिक टेस्ट की योजना संवेदनशीलता के साथ बनाई गई योजना है किंतु कोई भी योजना की नीयत कितनी भी अच्छी हो, यदि अच्छी नीति के द्वारा कार्य रूप में उसे परिवर्तित न किया जा सके तो योजना पर प्रश्न उठता है। कॉलेज की पढ़ाई को और उसमें लाए गए प्रतिशत को यदि सभी परीक्षाओं में उचित महत्व दिया जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही अपनी पूर्ण सार्थकता को महसूस करेंगे। ध्यान सिर्फ इस बात का रखना है कि-" पत्तों से चाहते हो बजेें साज की तरह; पेड़ों से आप पहले उदासी तो लीजिए।"-' शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे 🙏🌹