"अप्रैल फूल डे" हम मनाएं या ना मनाएं किंतु जीवन काअनुभव बार-बार इसकी गवाही देता है कि अनेक मौके पर मूर्ख साबित हुए हैं फिर भी हम अपने आप को बुद्धिमान माने चले जाते हैं और घोषित किए चले जाते हैं , जो सबसे बड़ा मूर्खता का सबूत है। प्रचार के इस ज़माने में आचार पर किसकी निगाह जाती हैं?प्रचार काआधार और आकार को देखकर 'अति सर्वत्र वर्जयेत' सूक्ति प्रचार के संबंध में आज बहुत याद आ रही है। सभी प्रकार की इंद्रियों को आकर्षित और प्रभावित करने के लिए समस्त साधन जुटा लिए गए है। फिर भी स्वयं पर भरोसा नहीं है इसलिए24hrs की सक्रियता और सघनता पर भरोसा रखा जा रहा है। इस हालात को देखकर एक यात्रा की अपनी अनुभूति मुझे स्मरण हो आई-" ट्रेन में बैठकर बिहार जा रहा था और उस रेल के डिब्बे में एक व्यक्ति जोर-जोर से चिल्ला रहा था कि मक्खी की अचूक दवा आप ले लो। हर जगह लोग मक्खी से परेशान होते हैं और उसका जोरदार प्रचार-प्रसार का अभियान सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्यों न इसे लेकर घर चलें। परिजन भी खुश होंगे कि ऐसी दुर्लभ दवा कहां पाई। लगभग सभी ने डिब्बे में उसके प्रचार-प्रसार से प्रभावित होकर दवा खरीद ली। एक सज्जन उसे खोलने के लिए उत्सुक हुए तो उसने तुरंत मना कर दिया। इसे तो आप अपने घर पर ही खोलिएगा और रामबाण प्रभाव को देखिएगा। घर वालों के लिए मैं कई प्रकार के सामान ले गया था किंतु सबसे बड़ी दिलचस्पी मेरी इस दवा का प्रभाव दिखाने की थी। जब सब खाने पर बैठे और कुछ मक्खियां भिनभिनाने लगीं तो मैं तुरंत उस दवा को निकाला। कागज के कई तह में वह दवा लिपटी थी और मैं एक के बाद एक तह हटाता गया। लगभग सात तह हटाने के बाद एक कागज की पुड़िया मिली ,जिस पर लिखा था -मक्खियां हटाने के लिए 'दाहिने हाथ से खाइए और बाएं हाथ को हिलाईए'। मैं मौन समाधि में चला गया और सभी मेरी ओर एकटक देख रहे थे। घर में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा व्यक्ति अवाक् और स्तब्ध दशा में एक तरफ उस प्रचार को खुली आंखों से देख रहा था और दूसरी तरफ भिनभिनाती मक्खियों को हटाने के लिए अपना बायां हाथ हिला रहा थाऔर घर वाले इस रहस्यमय पुड़िया का राज बार-बार पूछ रहे थे।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹