"समान शिक्षा का आंदोलन":कनिष्क कटारिया हों या अवनी बामनिया; दोनों की सफलता यह संदेश देती हैं कि हर आत्मा परमात्मा का अंश है। लिंग,जाति,क्षेत्र से कोई बड़ा अंतर नहीं पड़ता। अंतर पड़ता है शिक्षा से। इन दोनों को अच्छे शिक्षक और शिक्षा का वातावरण मिला और गुमनाम चेहरों को नई पहचान मिली। इस जनजातीय पिछड़े क्षेत्र में भी अच्छे शिक्षक और शिक्षा का उत्कृष्ट वातावरण मिल जाए तो अनेक प्रतिभाएं विविध क्षेत्रों (शिक्षा,खेल, कला) से निकलकर अन्यों को प्रेरित कर सकती हैं। जरूरत है सिर्फ एक आंदोलन की, जिसका नाम हो-"समान शिक्षा का आंदोलन". कनिष्क और अवनी रूपी बीज यदि आज वटवृक्ष बने हैं तो इसमें मुंबई और दिल्ली को ज्यादा श्रेय नहीं मिलना चाहिए बल्कि इनके संकल्प को, इनके शिक्षकों को और शिक्षा के वातावरण को पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। जनजातीय क्षेत्र के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में सरकार और समाज द्वारा ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि शिक्षक अपना शत-प्रतिशत ध्यान एकलव्यों की पहचान करने में और उनकी प्रतिभा को तराशने में लगा दें। शिक्षकों से पूछा जाता हैं कि अभी तक आपने इस क्षेत्र से एक भी आईएएस /आईपीएस क्यों नहीं तैयार किया? शिक्षक भी कहना चाहता है कि हमें दिन-रात पढ़ने-पढ़ाने तो दो-" कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा, कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा। किंतु मुझको आज आंचल से बचाओ, आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।।"- 'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे नव-वर्ष और नव-अंकुर की बधाई एवं शुभकामना सहित 🙏🌹