"भगवान महावीर के अनेकांतवाद" की जरूरत आज के एकांतवादी व आतंकवादी परिवेश में ज्यादा है। भले ही उनका जन्म 521B.C में हुआ हो किंतु उनकी चेतना ने इतनी ऊंचाई ली कि आज के अत्याधुनिक युग की मानव-चेतना क्षुद्र और संकीर्ण दिखने लगती हैं। आज भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व मेँ अपनी दृष्टि को ही संपूर्ण सत्य घोषित करने की होड़ मची है। इस एकांतवादिता की प्रवृत्ति ने पहले कट्टरता और फिर आतंकवाद को जन्म दिया- चाहे वह वामपंथ हो या दक्षिणपंथ अथवा अन्य कोई पंथ।भगवान महावीर का अनेकांतवाद कहता है कि कोई दृष्टि पूरी नहीं है ,कोई दृष्टि विरोधी नहीं है ,सब दृष्टियां सहयोगी हैं और सब दृष्टियां किसी बड़े सत्य में समाहित हो जाती हैं। जिसे विराट सत्य का अनुभव है, उसके लिए विरोधी जैसी कोई चीज ही नहीं है बल्कि सब एक दूसरे के परिपूरक हैं। प्रसिद्ध दृष्टांत हैं कि एक हाथी को पांच अंधों ने अलग अलग प्रकार का बताया -कोई खंभे की तरह,कोई सूप की तरह, कोई रस्सी की तरह...। वे आपस में लड़ने लगे। तभी कोई आंख वाला प्रज्ञावान वहां पहुंचा और सबको शांत कर कहा कि तुम सब अपनी दृष्टि से सही हो लेकिन ये सत्य के एक-एक कोने हैं। कलह का मूल कारण है-अपनी दृष्टि को ही संपूर्ण सत्य घोषित करने लगना। लड़ाई राम और रहीम में या मोहम्मद और क्राइस्ट के बीच नहीं होती लेकिन उनके अनुयायियों के बीच होती हैं। क्योंकि अनुयायी अंधे हैं, वे हाथी का पैर ,पूंछ या कान पकड़कर बैठे हैं और ताल ठोककर उसी एक अंग को संपूर्ण हाथी बता रहे हैं। जब तक अंधों की आंख नहीं खुलती और संपूर्ण हाथी दिखाई नहीं देता तब तक हिंसा जारी रहेगी। खासकर शिक्षा जगत का यह पुनीत कर्तव्य है कि महावीर स्वामी के जन्म-दिवस के शुभ अवसर का सदुपयोग अनेकांतवाद की इस व्यापक दृष्टि को स्वयं के जीवन में उतारने और अन्य जनों के जीवन में प्रचारित-प्रसारित करने हेतु करे।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे महावीर जयंती की मंगलकामनाओं के साथ🙏🌹