दर्शन
April 21, 2019प्र. सर!गलत काम करने वाले अधिकतर पढ़े-लिखे लोग ही होते हैं ,ऐसा क्यों? उ.- प्रिय विद्यार्थी!"दर्शन" भारतीय संस्कृति का सबसे पहला विषय रहा। आज भी किसी भी विषय में सर्वोच्च उपाधि पीएचडी (Ph.d)दी जाती है जिसका अर्थ है-"Doctorate in Philosophy". अभिप्राय है कि सर्वप्रथम दर्शन(दृष्टि) सम्यक होना चाहिए। ज्ञान (पढ़ाई-लिखाई) का उद्देश्य क्या है? आज तो धन-पद-प्रतिष्ठा अर्जित करना उद्देश्य है। प्राचीन समय में ज्ञान का उद्देश्य मुक्ति था- "ज्ञानेन मुक्ति:"। अपने दर्शन के अनुसार गौतम राजकुमार होते हुए भी धन- पद-प्रतिष्ठा को छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल गए, जिसके कारण बुद्ध बन गए। आज दृष्टि असम्यक हो गई हैं, अतः निगाहें धन-पद-प्रतिष्ठा पर ही टिकी हुई हैं। मानव के मूल्यांकन का एकमात्र आधार "having" हो गया है। कोई नहीं देखता या पूछता कि किन साधनों से और तरीकों से धन,पद,प्रतिष्ठा मिली हैं।"Being" अर्थात् सच्चाई,ईमानदारी रूपी आंतरिक संपदा का समाज में अवमूल्यन हुआ है। अतः सहीराम जैसा पढ़ा-लिखा ऊंचे पद पर स्थित व्यक्ति भी गलत तरीके से करोड़ों की संपत्ति कमाए जा रहा था। किंतु गौर से देखो इस असम्यक दृष्टि ने सहीराम को क्या दिया- जेल अर्थात् बंधन। धन-पद-प्रतिष्ठा अच्छा जीवन जीने के लिए साधन हैं, साध्य नहीं। यदि अच्छा जीवन कम धन में भी जीया जा सके तो सत्य-ईमानदारी का जीवन मुक्त कर देता है।जीवन के अनुभव ने मुझे तो यही बताया कि परमात्मा ने पैर दिया है और इस पैर से चलकर अपने दर्शन के अनुसार तुम मंदिर भी पहुंच सकते हो और मधुशाला भी-" जैसी दृष्टि ,वैसी सृष्टि।"- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹