"विश्व पुस्तक दिवस" -"दो रोटी कम खाएंगे,किताब नई लाएंगे"-अपने गांव के इस नारे के साथ बड़े होने वाले युवकों के साथ मेरी मुलाकात हो गई। स्नातक परीक्षा होने के बाद मैं अपनी जिंदगी की राह ढूंढ रहा था। प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के इलाके से आने वाले इन नौजवानों की माली हालत बहुत खराब थी। मुश्किल से दो-तीन जोड़ी कपड़े थे और घर-किराया देने के बाद खाने के लिए रुपए कम पड़ जाते थे। फिर भी वे हर महीने कोई न कोई नई पुस्तक अवश्य खरीदते थे। अत्यंत छोटे से कमरे में चार -चार विद्यार्थी रहकर दिन-रात अध्ययन- अध्यापन में लगे रहते थे। उनकी संगति में मैं उनके विचारों व व्यवहारों को जीवन में उतारने लगा। गंदी बस्ती में और सबसे सस्ते मकान में रह कर भी उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी थी कि उस स्थान को "मठ" कहा जाने लगा। वे सारे गांव के सरकारी संस्कृत स्कूलों से पढ़ कर आए थे ,अतः मंत्रोच्चार और व्रत-उपासना भी साथ साथ चलता था। वे शनिवार और मंगलवार को बजरंगबली के नाम पर उपवास रखते थे किंतु उपवास के पीछे की मूल अवधारणा धर्म की कम थी और किताबों के लिए पैसा बचाने की ज्यादा थी। कुछ ही दिनों में वह मठ पटना का एक विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया क्योंकि एक आईपीएस बन गया और अन्य सभी बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में सफलता पाने लगे। आलीशान महलों के नवयुवक जब सफलता का राज जानने के लिए उस मठ में आने लगे तब पता चला कि-" कुसुम मात्र खिलते नहीं राजाओं के उपवन में, अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुंज-कानन में ।कौन जाने रहस्य प्रकृति का ,बड़ा अनोखा हाल ,गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।।"- झोंपड़ी के सामने मैंने महलों को सर झुकाते पाया और कारण था-"पुस्तक और प्यास"। जब मैं घर वालों के आशीर्वाद के साथ अपने मठ की संगति से व्याख्याता बनकर बांसवाड़ा पहुंचा तो पाया कि शैक्षिक दृष्टि से राजस्थान का सबसे पिछड़ा जिला होने का मूल कारण है- "ट्यूशन की प्रवृत्ति और पासबुक की विकृति". यदि यह जनजातीय क्षेत्र आगे बढ़ना चाहता है तो "विश्व पुस्तक दिवस"के आज के शुभ दिन संकल्प लेना होगा कि पुस्तक की संस्कृति और स्वाध्याय की प्रवृत्ति हम विकसित करेंगे। 22 वर्षों से इस दिशा में शनै:-शनै:"शिष्य-गुरु संवाद" के माध्यम से यह प्रयास चल रहा है। किंतु जब तक शिक्षार्थी और समाज इसे जनांदोलन का रूप नहीं देते तब तक बहुत बड़ा परिवर्तन संभव नहीं। कपड़ों के ,श्रृंगार-प्रसाधन के और खाने-पीने की दुकानों की बांसवाड़ा में कमी नहीं है। कमी है तो एक पुस्तक केंद्र की और उस जगह आने के लिए प्यास जगाने की जो झोंपड़ियों में भी ऐसे चिराग पैदा कर देती है जिसकी रोशनी महलों को भी चकाचौंध कर जाती है।- "शिष्य-गुरु संवाद"से डॉ सर्वजीत दुबे "विश्व पुस्तक दिवस" की शुभकामनाओं के साथ 🙏🌹