(?) सर!धर्म और जाति के आधार पर चुनाव नहीं होना चाहिए किंतु उम्मीदवार के चयन से लेकर प्रचार और वोटिंग तक इसी आधार पर होता है, ऐसा क्यों? उ. - प्रिय विद्यार्थी !क्योंकि परंपरा की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। हमारे आदर्श ग्रंथ रामायण और महाभारत में प्रत्येक वर्ण और आश्रम के कर्तव्य निर्धारित कर दिए गए हैं। यद्यपि गुण और कर्म के आधार पर किया गया यह मनोवैज्ञानिक विभाजन था किंतु कबीलाई व्यवस्था के कारण यह जातीय समूह में तब्दील हो गया। और एक जाति दूसरी जाति से संघर्षपूर्ण संबंध बना बैठी। ज्ञान ,शक्ति ,धन और सेवा की ओर उन्मुख मन होता है किंतु शादी के समय मन पर निर्णय नहीं लिया जाता ;धर्म ,जाति के आधार पर निर्णय लिया जाता है। फलत: दांपत्य जीवन बेमेल हो गया। संविधान की शपथ लेते हुए भी सरकारें धर्म और जाति की हमारी पहचान पूछकर आंकड़े जुटाती हैं । चीन में एक ही परिवार में कोई बौद्ध हैं तो कोई इसाई, कोई मुस्लिम है तो कोई अन्य मत को मानने वाला। किंतु पूरे परिवार का मन या तो शैक्षिक (ब्राम्हण)है या शक्ति को चाहने वाला (क्षत्रिय); परिवारजनों को धन (व्यवसाय/ वैश्य)की प्यास है या सेवा (सहायककर्मी) की। आश्चर्य की बात है कि बहुत सारे विकसित देशों में भी यही 4 मनोवृतियों वाले लोग हैं जिन्हेंEducationist,Administrative,Industrialist औरAssistant नामों से आज पुकारा जाता है ,जो हमारे वर्णाश्रम व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं। यहां जन्म के साथ ही माथे पर किसी धर्म ,जाति का लेबल लगा दिया जाता है, किंतु उस लेबल को हटाने की सामर्थ्य शिक्षा में हैं। संविधान के दिए हुए मूल्यों के अनुसार" शिक्षा" ऐसे मन का निर्माण कर सकती है किंतु कितने लोग संविधान को देखते हैं, पढ़ने की तो बात दूर। जिह्वा से लिया गया शपथ हृदय (मन )में जमाए गए गहरे भाव के समक्ष बहुत कमजोर पड़ जाते हैं-"हृदय के विरुद्ध जिह्वा खड़ी है ;और प्रिया उसे ही सत्य बताने पर अड़ी है"- हमारा द्वंद्व(conflict) यही है।- "शिष्य-गुरु संवाद"से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹