"काम बोझ या आनंद बने, स्वयं पर निर्भर है" : कोई भी काम आपको थकान देगा या आनंद, यह कार्य के प्रति आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। आइंस्टीन की "रिलेटिविटी थ्योरी"इस बात का समर्थन करती है कि समय सापेक्ष होता है। यदि आप दुश्मन के साथ है तो समय कटता ही नहीं और यदि मित्र के साथ है तो समय का पता ही नहीं चलता। चुनाव के कार्य को अति-गंभीरता के साथ जोड़कर तनावपूर्ण बना दिया गया है। हर एक को लगता है कि किसी भी गलती को क्षमा नहीं किया जाएगा जबकि काम करने पर कुछ गलतियां तो होती ही हैं। यह दृष्टिकोण चुनाव ड्यूटी को बोझिल और तनावपूर्ण बना देता है। कार्य भी इतना ज्यादा होता है कि सब को शत-प्रतिशत ध्यान के साथ नहीं किया जा सकता ।अतः हर कोई इससे बचना चाहता है। किंतु कुछ लोगों को मैंने देखा है, जो चुनाव ड्यूटी को हंसते-गाते करते हैं। जब इसका राज जानने की कोशिश की तो पता चला कि अधिकारी ने सबको आश्वस्त कर रखा है कि अपनी शत-प्रतिशत क्षमता के साथ ध्यानपूर्वक काम करो; फिर भी कोई गलती होती है तो मैं संभाल लूंगा। ऐसे अधिकारी के कर्मचारियों को पर्याप्त विश्राम करने की सुविधा होती थी ताकि मजे से वे काम के समय अपनी पूर्ण ऊर्जा का सदुपयोग कर सकें। इतनी ज्यादा गर्मी और उस पर इतना ज्यादा काम का बोझ, पर्याप्त विश्राम का अभाव और उस पर निलंबन का डर ;ये सब मिलकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करते हैं कि गलती और ज्यादा होती हैं। परमात्मा कृपा करे कि ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में मन:स्थिति भय की न होकर सुरक्षा और प्रेम की हो। सब एक दूसरे का पूर्ण सहयोग करें और अपनी शत-प्रतिशत क्षमता का उपयोग करें तो चुनाव ड्यूटी भी खेल(play) के समान आनंदपूर्ण हो जाएगी।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹