"Winability ने राजनीति की Credibilityकम कर दी" : गांधी जी ने चोरी-चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को अचानक स्थगित कर दिया क्योंकि हिंसा के रास्ते से प्राप्त हुई आज़ादी उनको मंजूर नहीं थी। आज किसी भी रास्ते से प्राप्त हुई जीत हर राजनीतिक दल को मंजूर है। अतः उम्मीदवार के चयन में जीतने की योग्यता(winability) एकमात्र पैमाना रहा ;चाहे वह उम्मीदवार भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी अथवा अपराधी हो। इस सोच ने आज की राजनीति की विश्वसनीयता (Credibility)को निम्नतम स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। "सत्यमेव जयते"वाला भारत "सतामेव जयते" के रास्ते पर आगे बढ़ चला है। जो भी पार्टी सत्ता में आ जाएगी ,वह अपने आप को सत्य मानने लगेगी और बताने लगेगी। किंतु गौर करने की बात है कि सत्ता बहुसंख्यक की मोहताज होती हैं ,सत्य नहीं। लेकिन सत्य अपने आप में इतना ताकतवर और आकर्षक होता है कि अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में दूरदराज के गली-गली में स्वत:स्फूर्त कैंडल मार्च निकल गया और सत्ता ने घुटने टेक दिए। चुनाव सिर्फ जीतने के लिए नहीं लड़ा जाता। लोकसभा चुनाव एक शुभ अवसर है जब भारत की जनसंख्या, पर्यावरण, शिक्षा, बेरोजगारी ,किसानी की समस्याओं पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नए-नए विचार आते ,जनता में उनकी चर्चा चलती और एक जन जागरूकता के अभियान के साथ मतदान के बाद नई सरकार बनती। फिर लोक और तंत्र दोनों मिलकर उन समस्याओं के समाधान की दिशा में आगे बढ़ते। इससे लोक का तंत्र में विश्वास बढ़ता और तंत्र का लोक में भरोसा। किंतु दुर्भाग्य से लोक और तंत्र के बीच की खाई बहुत गहरी और चौड़ी होती जा रही हैं क्योंकि जब तक चुनाव मूल्य और विचारधारा के लिए लड़े जाते थे तब तक जनता अपने नेता के प्रति आदर से भरी होती थी। बाबा साहब, वाजपेयी जैसे कई नेता चुनाव हार कर भी अपनी विचारधारा के कारण दिलों को जीत लिया करते थे। आज के नेता चुनाव तो जीत जाएंगे लेकिन क्या दिलों को भी जीत सकेंगे?- "शिष्य-गुरु संवाद"से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹