प्र. सर! परिचर्चा,वाद-विवाद और भाषण कला सीखने के लिए आपने टीवी देखने को कहा किंतु टीवी पर तो अधिकतर सब लड़ते-झगड़ते रहते हैं और अपशब्दों का उपयोग करते हैं, अब क्या किया जाए? उ. : प्रिय विद्यार्थी! जन-जागरण और सामाजिक सुधार का सबसे सशक्त माध्यम मीडिया (पत्रकारिता)और राजनीतिक दल ही थे किंतु दुर्भाग्य से अब ये दोनों क्षेत्र व्यवसाय बन गए। स्वतंत्रता प्राप्ति में इन दोनों की भूमिका अनुकरणीय व अनुशरणीय थी। किंतु अब इन दोनों ने अपना लक्ष्य (Goal) बदल लिया है। जब मार्गदर्शक ही मार्ग भटकाने लगें तो निश्चित ही युवा पीढ़ी का भविष्य खतरे में है। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए सनसनीखेज खबर और ब्रेकिंग न्यूज़ के चक्कर में खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पड़ गया है। इसका परिणाम यह हो गया है कि कोई भी घटना इतने रंगों में रंग जाती हैं कि उसका असली रंग ही पता नहीं चलता। यदि एक बार आस्था के केंद्रों पर से विश्वास उठ जाए तो फिर जीवन जीना बहुत मुश्किल हो जाता है-" सादा सरल जीवन था , लेकिन बहुत जटिल अनुवाद हो गया"- ऐसे में शिक्षा जगत और शिक्षकों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे विद्यार्थियों को बताएं कि सत्य व सार्थक क्या है? राजनीतिक दल अपना कार्यकर्ता तैयार करने की फिराक में है और मीडिया अपना दर्शक किंतु शिक्षक सिर्फ अच्छा इंसान और भारत का अच्छा नागरिक तैयार करने के मकसद से जी रहा है। 'क्या पढ़ना और देखना चाहिए'इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि "क्या नहीं पढ़ना और देखना चाहिए?"- इसका विवेक और सामर्थ्य मेरी नजरों में शिक्षकों के पास हैं ;बशर्ते उन्होंने भी अपना"अध्यवसाय"छोड़ कर कहीं व्यवसाय न शुरू कर दिया हो।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹