सात जनम का साथ है हमारा तुम्हारा
May 12, 2019मदर्स डे की शुभकामना के साथ मैं भी अपने दिल की एक कशमकश को आपके साथ साझा करना चाहता हूं। मदर्स डे के दिन समाचारपत्र के मुखपृष्ठ पर एक सुझाव था कि कम से कम आज मां को कहीं घुमाने ले जाएं ,उसके किसी इच्छा को पूरा करें और उसके साथ समय बिताएं। ऐसे शोधपूर्ण सुझाव पश्चिम के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों द्वारा दिए जा रहे हैं क्योंकि वहां मां भी कई पति बदल चुकी हैं और पिता भी कई पत्नियां बदल चुके हैं। ऐसे में मातृ-पितृ दिवस (Mothers या Fathers day) के बहाने उन जैविक-प्राकृतिक- स्वाभाविक संबंधरूपी हॉज में बाहर से प्रेम रूपी पानी डालने का प्रयास किया जाता है। किंतु भारतीय संस्कृति में दांपत्य जीवन-" सात जनम का साथ है हमारा तुम्हारा"- के मनोभाव के साथ आज भी अपेक्षाकृत चिरस्थायी है। दांपत्य जीवन की पूर्णता संतान के जन्म के साथ जुड़ी है और-" हम न रहेंगे ,तुम न रहोगे ;रह जाएगी ये निशानियां"- के मनोविज्ञान के साथ जैविक अमरता के सिद्धांत से भीे जुड़ी हैं। मैंने अपने मां-बाप को या मेरे मां-बाप ने मुझको कभी नहीं कहा कि मैं आपको/ तुमको प्यार करता हूं किंतु इस शब्द के प्रयोग के बिना भी हर डांट-फटकार में और हर जिद में अपना प्यार छलकता था क्योंकि-" मोहब्बत जो करते हैं ,वे मोहब्बत जताते नहीं ,धड़कनें अपने दिल की कभी किसी को सुनाते नहीं"- किंतु आज "आई लव यू मम्मा /आई लव यू डैड "आम प्रचलन में है।कुएँ मेँ पानी अंतरतल से संबंधित समुद्र से आता है,हौज की तरह बाहर से नहीं डाला जाता।मां का संबंध बच्चे के साथ या बच्चे का संबंध मां के साथ इतनी गहराई के साथ जुड़ा है कि-"शाख से पता अगर कोई जुदा हो जाएगा, तो हादसों का फिर शुरू सिलसिला हो जाएगा"-यह हादसा आज सर्वत्र घटित हो रहा है क्योंकि नौकरी ने घर ही नहीं छुड़ाया बल्कि नैसर्गिक संबंधों को भी छुड़वा दिया किंतु तन की दूरी मन के नजदीकियों को और बढ़ा देती है।बढ़ते वृद्धाश्रम सबको दिखाई देते हैं किंतु बढ़ते क्रैच बहुत कम को।यही कशमकश जीवन है-
'शिष्य-गुरु संवाद'से डा.सर्वजीत दुबे🙏🌹