चुनावी कटु-वाणी ने भारत के मन का आपा असहनीय हद तक बढ़ा दिया है जबकि सबने पढ़ रखा है कि-"वाणी ऐसी बोलिए,मन का आपा खोय।" वाणी और मन पर गहरी साधना करने वाले ऋषि बोलने के पहले परमात्मा से प्रार्थना करते थे कि हे परमात्मा!मेरी वाणी मेरे मन में स्थित हो; अर्थात् मेरी वाणी से वही निकले जो मेरे मन में हो। हर नेता को बोलने के बाद बार-बार सफाई देनी पड़ती है कि मेरे कहने का आशय ऐसा नहीं था। यदि आपके मन में ऐसा नहीं था तो ऐसे वचन क्यों निकल रहे हैं? गंगोत्री यदि साफ व स्वच्छ हो तो गंगा मैली रूप में कैसे निकल सकती हैं? दरअसल राजनीतिक मन गला काट प्रतियोगिता रूपी जहर से भरा है तो फिर उससे अमृत रूपी वचन कैसे निकल सकते हैं? ऐसी पृष्ठभूमि में कम और संतुलित बोलने वाले नेताओं की छवि मन को मोह लेती है। अच्छा वक्ता होना नेता बनने की एक आवश्यक शर्त है किंतु पर्याप्त नहीं। बहुत ऐसे नेता हुए हैं जो अच्छा वक्ता नहीं थे और बहुत कम बोलते थे किंतु जनता में उनका प्रभाव बहुत ज्यादा था। मीडिया की भी नजर ऐसे नेताओं की खोज में नहीं है। विवादित बयानों पर लंबी बहस और सफाई ने टीवी के दर्शकों को बहुत निराश कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति कुलीश के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत कम बोले। जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों वे करते हैं तो उन्होंने कहा कि मैं जब बोला तभी फंसा। गांधी जी बहुत अच्छे वक्ता नहीं थे किंतु उनकी वाणी मन की इतनी गहराइयों से निकलती थी कि उसका प्रभाव अद्भुत होता था। इसका कारण था मन, वचन, कर्म की उनकी एकता और मौनव्रत की साधना।-' शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹