विश्व परिवार दिवस
May 15, 2019"विश्व परिवार दिवस" पर परिवार संरक्षण की दुहाई देते कुछ आलेख पढ़ने के बाद मेरे विद्यार्थी मन में एक प्रश्न उठा- "यदि शिक्षा, संस्कार ,अनुशासन और मिलनसारिता के गुण परिवार में सीखने को मिलते हैं तो यह संस्था अपने आप मजबूत होती चली जानी चाहिए थी ?किंतु हकीकत यह है कि यह संस्था टूट रही है और इसके लिए व्यक्ति ज्यादा जिम्मेदार हैं या बदलती परिस्थितियां?कृषिआधारित-अर्थव्यवस्था अथवा एक विशेष व्यवसाय से जुड़े लोगों में तो यह परिवार संस्था आज भी जीवित है लेकिन अन्यत्र परिवार का ताना-बाना बिखरता जा रहा है। जमीन,जायदाद को लेकर दर्ज पारिवारिक मुकदमों की संख्या इस बात की गवाही देती हैं कि व्यक्तिवादिता सामूहिकता के सिद्धांत पर भारी पड़ रही है। आधी आबादी के शोषण पर टिकी यह परिवार व्यवस्था अधिकांशत:सामंतवादी मनोवृति वाली थी। औद्योगिकरण के कारण ग्रामीण-अर्थव्यवस्था शहरी-अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गई और लोग अपनी आजीविका की खोज में घर-परिवार से दूर बसने को मजबूर हो गए। पारिवारिक आयोजनों और पर्व- त्योहारों के अवसर पर होने वाला मिलन भी शनै:-शनै:कम होने लगे। प्रतियोगितापूर्ण शैक्षिक और ऑफिस के माहौल ने व्यक्ति के अवकाश को छीन लिया। मोबाइल और इंटरनेट ने पारिवारिक-आत्मिक रिश्तों को शाब्दिक बना दिया, तभी तो-" सरलता और सरसता किताबों में खूब पढ़ते आते हैं , किंतु हकीकत की दुनिया में वे बामुश्किल नजर आते हैं "- जीवन का अनुभव यह गवाही देता है कि मनुष्य का हृदय रूपी फूल अनौपचारिक संबंधों में ही खिलता है। परिवार के खतरे में पड़ने से हृदय पक्ष कमजोर पड़ता जा रहा है ,जिसका परिणाम एकाकीपन व विषाद के रूप में देखने को मिलता है। किंतु परिवार में भी जब बाजार की मानसिकता हावी होने लगे तो आपसी प्यार के तंतु कमजोर पड़ेंगे ही-" हम खुद पर तरस खाने लगे हैं , अब ऐसे भी दिन आने लगे हैं । पहले मन की बात सबसे करते थे , पर आजकल अपनों से भी छुपाने लगे हैं ।।" अक्लवालों की दुनिया में दिल की दुनिया बसानी एक बहुत बड़ी चुनौती है।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹