विद्यासागर की मूर्ति का तोड़ा जाना
May 16, 2019"विद्यासागर की मूर्ति का तोड़ा जाना"एक प्रतीकात्मक संदेश देता है। वह प्रतीकात्मक संदेश इस सच्ची घटना में छिपा है जो बिहार के एक गांव में घटी। उस गांव के दो परिवार दो अलग-अलग पार्टियों से जुड़े थे। दो विचारधारा की लड़ाई वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो गई। दोनों बाहुबली थे और एक दूसरे को मिटाने को तत्पर। सौभाग्य से दोनों परिवारों में विद्यासागर के समान एक- एक लड़के संवयस्क थे और बोर्ड परीक्षा की मेरिट में दोनों ने अपना स्थान बनाया था। किंतु राजनीति को सबसे बड़ा खतरा विद्यानुराग से होता है, यह बात उस दिन सामने आई जब उन दोनों में से एक निहायत सीधा-सादा मेधावी विद्यार्थी की हत्या कर दी गई। गांव में मातम छा गया क्योंकि गांव का नाम रोशन करने वाला चिराग असमय में बुझा दिया गया। इसकी प्रतिक्रिया में दूसरे दिन उस दूसरे मेधावी विद्यार्थी की भी हत्या हो गई। अखबार में शीर्षक छपा था-" राजनीति को आगे बढ़ाने वालों ने विद्या को आगे बढ़ाने वालों की बलि चढ़ा दी।" आश्चर्य की बात कि दोनों मेधावी विद्यार्थियों में गहरी मित्रता थी। चरागों के बुझते ही अंधेरा हो गया और उस अंधेरी रात में पूरे इलाके के लोगों को आकाश में टिमटिमाते वे दो तारे रात में चमकते दिखाई दे रहे थे और कह रहे थे-"हमारी लड़ाई तो सिर्फ अंधेरे से थी , हवाएं तो बेवजह ही हमारे खिलाफ हुई"- हवाएं दक्षिणपंथी हो या वामपंथी ;वो आज तक ज्यादा से ज्यादा चिरागों को बुझाती थीं किंतु अब तो मिटाने भी लगीं। यह देश के लिए बहुत खतरनाक संकेत है। जो भी विद्यानुरागी हैं उनसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि एक बार इस बात को सोचें- रोड लाइट में पढ़कर एक संवेदनशील ईश्वरचंद्र नाम का बालक विद्यासागर बनता है और शिक्षा संस्थान खोलकर खासकर बालिका शिक्षा के लिए अनेक कष्टों को सहते हुए जन-जागरण चलाकर कितनी जिंदगानियों को रोशन कर देता है, उसकी प्रतिमा राजनीति का शिकार क्यूँं बनती हैं? सकारात्मक राजनीति के योगदान को मैं स्वीकार करता हूं किंतु भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान विद्यासागरों का है, यह सत्य सर्वविदित है। विद्यासागर और विद्यालय पर राजनीति न हो तो भारत के लिए शुभ होगा। खिन्न और टूटा हृदय कह रहा है-" हवाओं से कह दो, खुद को आजमा के दिखाएं । बहुत दीपक बुझाती हैं , एक जला के दिखाएं ।।"- "शिष्य-गुरु संवाद" से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹