"मानस-कबंध" : आज का राजनीतिक मन 'कबंध' के रूप में उपस्थित है-'क' यानी कठोर, 'बंध'अर्थात् बंधन। सबसे कठोर बंधन "संवेदना शून्य मन"का है। लकड़ी,पत्थर, लोहा,वज्र उत्तरोत्तर कठोर होते हैं किंतु 'संवेदन शून्य मन' के सामने उनकी कठोरता कुछ नहीं है। यही कारण है कि आज के राजनीतिक मन से कठोर वचन और हिंसक कर्म निकल रहे हैं। ऐसे में उपाय क्या है? उपाय इस कहानी में है- "एक कुएं से बहुत दुर्गंध उठ रही थी और उसकी बार-बार सफाई करने पर भी दुर्गंध कम नहीं हो रही थी। कुछ अक्लवालों ने बाहर से पवित्र नदियों का जल मंगा कर उसमें डाला;साथ ही इत्र का भरपूर छिड़काव किया। फिर भी दुर्गंध बढ़ती ही गई। एक राम कृपा प्राप्त प्रज्ञा-चक्षु ने कुएं में झांक कर देखा तो उसे दो कुत्ते पड़े हुए दिखे, जो मरकर सड़ चुके थे। उसके सुझाव पर दोनों कुत्तों को निकाला गया और फिर साफ-सफाई की गई तो दुर्गंध चली गई।"- आज भारत के राजनीतिक कुएं में "राग और द्वेष"नामक ये दो कुत्ते गिरकर मर गए हैं और सड़ चुके हैं। इन दो कुत्तों को निकालने के लिए अंतर्मन-रूपी कुएं में झांक कर इन्हें पहचानने वाली दृष्टि चाहिए। राम को जीने वाले बापू का यह संदेश आज का राजनीतिक मन क्या कभी सुन पाएगा और सुन कर भी क्या समझ पाएगा? समझ कर भी क्या आचरण में उतार पाएगा?- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹