"विद्या ज्योति: परम" कन्या महाविद्यालय (बांस.)के ध्येय-वाक्य का अभिप्राय क्या है?- प्रिय विद्यार्थी! जीवन मिट्टी का एक दीप है लेकिन उसमें जो ज्योति होती है वह मृण्मय की नहीं,चिन्मय की है। दीप पृथ्वी का लेकिन ज्योति अकाश की; दीप पदार्थ का लेकिन ज्योति परमात्मा की है। ज्योति निरंतर आकाश की तरफ उठती रहे तो दीप सीढ़ी हैं अर्थात् शरीर सेतु बन जाता है यदि आत्मा परमात्मा की तरफ अग्रसर हो। कितनी भी अंधेरी रात हो, दीप की ज्योति के जलते ही दूर हो जाता है। अतः मनुष्य की प्रार्थना है कि जीवन दीप के समान हो जाए ताकि अंधेरे और बुराइयों को दूर कर सके। लेकिन"दीया तले अंधेरा" होता है। अतः दीप की ज्योति से भी परम ज्योति "विद्या"है। कोई भी दीपक जलाओ तुम्हारे अंदर के अंधेरे को दूर करने में समर्थ नहीं होता है। दीप की ज्योति के प्रकाश में पदार्थ दिखाई देता है किंतु विद्या रूपी ज्योति के प्रकाश में परमात्मा दिखाई देने लगता है अर्थात् आत्मा पूर्ण विकसित होकर परमात्मा बन जाती हैं। अतः विद्या-ज्योति दीप की ज्योति से बढ़कर है। उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता है और अन्य को रात में किंतु विद्या रूपी ज्योति के जलते ही दिन और रात सब प्रकाश से भर जाता है। हर कार्यक्रम में दीप-प्रज्वलन का विधान है जो इस बात का संकेत व संदेश देता है कि बुझा हुआ दीपक(विद्यार्थी) यदि जले हुए दीपक (शिक्षक) के पास आता है तो बुझा दीपक भी जल उठता है। शिक्षा केंद्र इसीलिए बनाए जाते हैं।- "शिष्य-गुरु संवाद" से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹