"सबका विश्राम" : राजपीठ ने तीन मंत्र सामने रखे-" सबका साथ,सबका विकास,सबका विश्वास". किंतु व्यासपीठ ने उसमें एक मंत्र और जोड़ा-" सबका विश्राम", यह थोड़ा गहराई से समझने योग्य है। प्रकृति में दिन का जितना महत्व है, उतना ही महत्व रात्रि का भी, श्रम का जितना महत्व है ,उतना ही महत्व विश्राम का भी । बुद्धि एक की बहुत प्रशंसा करती है और दूसरे को छोड़ देती है किंतु सर्वज्ञ परमात्मा सृजन को जितना महत्व देते हैं उतना ही संहार को भी ;क्योंकि --"मंजिल ,मंजिल करती दुनिया , मंजिल है कोई शै नहीं । जिसको देखा चलते देखा, पहुंचा तो कोई है नहीं।।" बुद्ध ने भी "सम्यक् आजीविका" और "सम्यक् व्यायाम"शब्द का प्रयोग अपने 'अष्टांग मार्ग' में किया था। आज विकास की दौड़ में वह श्रम असम्यक् हो गया है। रजोगुण के साथ प्रकृति ने तमोगुण भी बनाया है ताकि संतुलन सध सके। दौड़ते/ घूमते हुए Wheel ( पहिया) की गति ठहरे हुए कील पर निर्भर है। अहर्निश गति और श्रम के कारण यह दुनिया प्रकृति से भयंकर छेड़छाड़ कर बैठी जिसका परिणाम पर्यावरण असंतुलन के रूप में सामने है और इसका विपरीत प्रभाव मानसिक संतुलन पर पड़ रहा है। भारतीय संस्कृति की आश्रम व्यवस्था में भी 50 वर्ष तक का समय प्रवृत्ति का था और उससे आगे निवृत्ति का। निवृत्ति का अर्थ कदापि 'आलस्य' नहीं है, इसका अर्थ है -अब सिर्फ अपने लिए मैं नहीं जिऊंगा बल्कि परमात्मा की दी हुई ऊर्जा से "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" जो कुछ सरलता से हो सके, उतना ही करूंगा। नेतृत्व करने वाले वर्ग के लिए यह सम्यक् विश्राम तो और भी जरूरी है क्योंकि यदि मस्तिष्क रूपी इंजन में Coolant न हो और गति के कारण वह गर्म हो जाए तो गाड़ी आगे नहीं चल सकती। अतः भारतीय संस्कृति में हर राजा अपना कुलगुरु या राजगुरु रखते थे ,जिनकी दृष्टि विश्राम, प्रेम तथा आनंद के कारण व्यापक और निरपेक्ष होती थी। राज्य की किसी भी जटिल समस्या पर बहुत ही शांत मन से कुलगुरु या राजगुरु विचार करके दूरदर्शितापूर्ण परामर्श देते थे। चुनाव के समय का माहौल बहुत ही कठोर और श्रमपूर्ण था जबकि देश चलाने के लिए माहौल प्रेमपूर्ण और शांति का होना चाहिए। अतः व्यासपीठ का "सबका विश्राम"रूपी मंत्र मेरे दिल को छू गया।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹