"राजनीतिक दलों और व्यासपीठ"में एक सम्मानित दूरी होनी चाहिए।क्यूँ?- क्योंकि दर्पण से एक निश्चित दूरी नहीं होने पर अपना चेहरा भी ठीक से नहीं दिखता और दर्पण भी नहीं दिखता। जिन आंखों पर कोई चश्मा लगा हो तो चश्मे का रंग दृष्टि( सोच) पर और उसकी व्याख्या पर अवश्य असर डालता है। सत्य के राही की आंखें पूर्वाग्रह, दुराग्रह और हठाग्रह से मुक्त होनी चाहिए। सत्ता जिसकी मंजिल हो उसकी कुछ मजबूरियां हो सकती हैं किंतु सत्य जिसकी मंजिल हो उसकी कोई मजबूरी नहीं होती। सत्यरूपी दर्पण में सत्ता अपना चेहरा देखती रहे तो संवार भी सकती है -" जिंदगी भर गालिब! वह भूल ही करता रहा ; गर्द चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा". व्यासपीठ को कुछ पाना नहीं हैं जिसके कारण वह मजबूर हो बल्कि रामकृपा प्राप्त हो गई है जिसको सिर्फ लुटाना है। फिर भी नित्य प्रति सर्वप्रथम हम अपनी आंखों को साफ कर लिया करते हैं क्योंकि इन आंखों से देखे गए सत्य पर और इस मुख से बोले गए वचन पर करोड़ों लोग श्रद्धा करते हैं। सत्ता तो सिर्फ जीने का साधन देती हैं ,जीवन तो सत्य ही देता है। वागड़ धरा पर श्री मुरारी बापू के मुख से कहे गए इन भावों को सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि जो बात व्यासपीठ पर लागू होती हैं ,क्या वही बात शिक्षापीठ पर लागू नहीं होती? शिक्षक भी तो सत्य का अन्वेषी है, फिर वे सत्ता से एक सम्मानित दूरी बनाकर क्यों नहीं रखते ?- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹