"क्या130करोड़ जनता कृष्ण है? खुशी के क्षण में कही गई इस बात पर मेरी निजी राय यह है कि मैं जनता(Public/Citizen) हूं लेकिन मैं तो अभी "अर्जुन"भी नहीं बन पाया हूं,"कृष्ण"बनने की बात तो बहुत दूर है। अर्जुन अपने समय का सबसे सुशिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्ति था और अपने कल्याण के लिए सदा ही कृष्ण के सामने प्रश्न खड़े करता था। वीर होते हुए भी युद्ध की निरर्थकता का प्रश्न सिर्फ अर्जुन के मन में उठता है और सखा के समान रहने वाले कृष्ण से वह अपनी जिज्ञासा करता है। अंत में कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण भी करता है। अर्जुन बनने के लिए व्यक्तित्व में विनम्रता, संवेदनशीलता और संवादशीलता का अद्भुत संगम चाहिए।. दूसरी बात कृष्णपूजक यह देश क्या कृष्ण के मर्म को समझ पाने की स्थिति में है? शायद नहीं, क्योंकि आज चुनाव भी महाभारत बन गया है जबकि कृष्ण की नजरों में महाभारत भी एक चुनाव था। कृष्ण ने स्वयं चुनाव किया था कि वे पांडवों की तरफ से अस्त्र-शस्त्र के बिना लड़ेंगे। उनके लिए धर्म के पक्ष में खड़ा होना ही पर्याप्त था,परिणाम चाहे जो हो। ऐसा क्यों किया कृष्ण ने? क्योंकि आत्मा की आवाज वे सुन रहे थे फिर जय-पराजय उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं थी। भीष्म, द्रोण,कर्ण इत्यादि भी आत्मा को उपलब्ध लोग थे लेकिन वे नमक का कर्ज़ अदा कर रहे थे जबकि कृष्ण सिर्फ आत्मा का फर्ज निभा रहे थे। आज भारत फिर से उसी नाजुक मोड़ पर खड़ा है लेकिन जीत-हार से ऊपर उठा हुआ किसी कृष्ण की प्रतीक्षा में है जो सिर्फ आत्मा की आवाज सुनता हो।- 'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹