,इस दिशा में सार्थक प्रयास किया जाए।। क्रोध में जरूर कभी-कभार जान देने और जान लेने की बात उठ जाती हैं किंतु शांत होकर विचार करने पर आत्मा से आवाज आती है कि
May 31, 2019एक आदिवासी प्रतिभा डा.पायल का मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर खुदकुशी कर लेने की घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। आदिवासी बहुल इलाके बांसवाड़ा में 22 वर्षों से एकलव्यों के गहरे संपर्क में हूं और सरकारी सेवा के समय के अतिरिक्त इस क्षेत्र की प्रतिभाओं के प्रेम के कारण नियमित व नि:शुल्क संवाद कर रहा हूं।मेरेअनुभव मेंअभाव और पीड़ा आदिवासियों के जीवन के अभिन्न अंग हैं लेकिन सामूहिकता की प्रवृत्ति के कारण इनका दंश उनको ज्यादा नहीं चुभता। ऐसी विषम परिस्थितियों से निकली डॉ पायल की खुदकुशी ने कई प्रश्न मेरे जेहन में खड़े कर दिए हैं-(१) अज्ञान के अंधेरे से निकल कर ज्ञान के प्रकाश में आते-आते कितनी प्रताड़नाओं को वह झेल चुकी होगी, फिर इस बार नई बात क्या थी?(२) लड़कियो को जन्म से ही पुरुष प्रधान समाज में कई प्रकार के भेदभाव झेलने पड़ते हैं, ऐसे में लड़कियां एक दूसरे के जान के दुश्मन क्यों बन रही?(३) सर्वाधिक संवेदनशीलता-संवादशीलता की अपेक्षा तथा आशा डॉक्टरों व शिक्षकों से की जाती हैं, यदि उनकी स्थिति ऐसी हैं तो अन्यत्र कैसी स्थिति होगी? लिंग ,जाति, धर्म क्षेत्र,रंग व विचारधारा जैसे अनेक आधार हैं जिन पर भेदभाव का शिकार कमोबेश सबको होना पड़ता है।किंतु भेदभाव को गहरे में अनुभव करने के बाद मेरे मन में विचार उठा कि 'भेदभाव क्यों होता है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है?" ,इस दिशा में सार्थक प्रयास किया जाए।। क्रोध में जरूर कभी-कभार जान देने और जान लेने की बात उठ जाती हैं किंतु शांत होकर विचार करने पर आत्मा से आवाज आती है कि "विषम परिस्थितियों को पीने व जीने की क्षमता का नाम ही प्रतिभा है।" बाबा साहेब को देखें या विद्यासागर को पढ़ें तो यही संदेश मिलता है कि-" बढ़ती चली गई उमर हर एक घूंट पर , पिया है हमने विष भी इतना कमाल से ".' शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹