विश्व पर्यावरण दिवस
June 4, 2019"विश्व पर्यावरण दिवस" 5 जून को मनाते हुए 40 वर्ष से ऊपर हो चुके किंतु परिणाम आज सामने है कि हवा प्रदूषित हो चुकी है, जल प्रदूषित हो कर सूख चुका है ;पृथ्वी हिलती रहती हैऔर आकाश आग बरसा रहा है।इस पर्यावरण में सिर्फ मनुष्य ही नहीं वरन् समस्त अस्तित्व संकटग्रस्त है। 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की कामना में जड़ और चेतन सभी आते हैं, तभी तो "पृथ्वी हमारी माता है और आकाश हमारा पिता है" का उद्घोष हमारी संस्कृति करती है। लेकिन जब से "विश्वपरक"दृष्टि "स्वपरक"दृष्टि में तब्दील हो गई तब से मनुष्य के लिए सब कुछ साधन हो गया और सिर्फ मानव साध्य रह गया। विज्ञान ने तो अभी वनस्पतियों में जीवन को स्वीकार किया है किंतु महावीर ने तो हजारों साल पहले पृथ्वी,जल, हवा,आग इत्यादि में जीवन को स्वीकार किया था-" आग है,पानी है,मिट्टी है, हवा है मुझमें ; फिर मानना पड़ता है कि खुदा है मुझमें ".. लेकिन खुद का अहंकार इतना बढ़ गया कि जिस प्रकृति में जन्म लेते हैं और पलते हैं, उसी प्रकृति को विकास के नाम पर हमने नष्ट कर डाला।अब चिल्लाते हैं कि जीएं तो जीएं कैसे? हृदयहीन'तंत्र'ने कठोर'यंत्र' के सहारे पहाड़ काट डाले और जंगल उजाड़ डाला क्योंकि ऋषियों के "मंत्र"-' ऋतस्य यथा प्रेत ' को हमने भुला दिया जिसका अर्थ है-" ब्रह्मांडीय नियम(Universal law) के अनुसार जीओ ".. यानी समस्त जीव जगत चाहे चर हो या अचर;सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किंतु हमने सजीव पेड़ को काटकर निर्जीव पत्थरों की दुनिया बना ली और फिर चिल्लाते हैं कि परमात्मा कहां है ?इसी प्रकृति में परमात्मा छिपा है किंतु वह मित्रभाव से दिखेगा- यही विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश है।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹