"मरीज-डॉक्टर-सरकार" : एक तरफ बुखार, लू से मरते सैकड़ों मरीज और दूसरी तरफ डॉक्टरों पर बढ़ते हमले के कारण हड़ताल पर जाने को मजबूर चिकित्सकगण और उसके उपर इस आपात स्थिति पर हो रही सियासत ने एक किंकर्तव्यविमूढ़ सी परिस्थिति पैदा कर दी है। मेरा विचलित मन बस एक ही सवाल पूछ रहा है कि-"क्या हम इतने संवेदनहीन और संवादहीन हो गए हैं ?डॉक्टर का अपने मरीज के साथ तथा शिक्षक का अपने विद्यार्थी के साथ " हार्दिक संबंध" भारतीय संस्कृति में रहा है, व्यावसायिक नहीं। किसी की जान बचाकर और किसी का जीवन संवार कर डॉक्टर व शिक्षक को जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है,वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कर्म करने की प्रेरणा देती रहती है। किंतु दुर्भाग्य से आज स्वास्थ्य व शिक्षा का क्षेत्र जबरदस्त कमाई का जरिया बना दिया गया है। अतः गगनचुंबी हॉस्पिटलों और कोचिंग संस्थानों ने एक तरफ प्रोफेशनल एटीट्यूड के कारण सेवा का स्तर बढ़ा दिया है तो दूसरी तरफ आपसी संबंधों में संवेदनशीलता को उसी अनुपात में घटा दिया है।डॉक्टर व शिक्षक अपने कार्यस्थल पर प्रेम से मुस्कुरा न सकें और मरीज व विद्यार्थी श्रद्धा से उनकी तरफ आंखें न उठा सकें तो समझिए कि संबंध की मूल आत्मा गायब हो गई। इस मूल आत्मा संवेदनशीलता को लौटाने के लिए काम की अनुकूल परिस्थितियां बनानी पड़ेंगी, जिसकी जिम्मेदारी सरकार की होती है। करोड़ों रुपए खर्च कर यदि कोई डॉक्टर बनता है तो उसकी निगाह में मरीज कम पैसा अधिक होगा। दूसरी तरफ जीडीपी का 1.5% स्वास्थ्य पर और 3% से कम शिक्षा पर खर्च करने वाली व्यवस्था में हम कैसे स्वास्थ्य व शिक्षा सेवा की उत्कृष्ट और संवेदनशील परिस्थितियां तैयार कर पाएंगे जबकि जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है,यह चिंता व चिंतन का विषय है। हड़ताल पर जाने के पक्ष में तर्क देते हुए कुछ डॉक्टरों का कहना है कि हम भी इंसान हैं, यह बात सही है किंतु चिकित्सक व शिक्षक ऐसे इंसान हैं जिन्हें अपने भगवान होने का अहसास भी हैं - " बहुत मुश्किल से बचाई थी जो अहसास की दुनिया , इस दौर के रिश्ते उसे बाजार न कर दे । यह सोचकर नजरें वो मिलाता ही नहीं है , आंखें कहीं जज्बात का इजहार न कर दे।।"- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹