"क्लास की ओर लौटो" : युवा पीढ़ी यदि कॉलेज के क्लासेज में नहीं आ रही है, तो उस वक्त को कहां पर बिता रही है?- यह किसी भी सरकार और समाज के लिए प्राथमिक चिंता और चिंतन का मसला होना ही चाहिए। इस पृष्ठभूमि में "क्लास की ओर लौटो" अभियान बहुत ही प्रशंसनीय है। योग्यतम शिक्षक जिस स्थान पर एक जगह उपलब्ध हों, उनके साथ बिताया गया समय विद्यार्थी को शिक्षा ही नहीं, संस्कार भी देता है। इसके लिए विद्यार्थियों की प्यास प्राथमिक शर्त है क्योंकि सच्चा प्यासा सरोवर ढूंढ ही लेगा। इसके बाद शिक्षकों की प्रतिभा व समर्पण तथा अनुकूल वातावरण का सहयोग मिल जाए तो बहुत बड़ा परिवर्तन संभव है। शैक्षिक दृष्टिकोण से अत्यंत पिछड़े और गरीब क्षेत्र वागड़ के लिए तो यह स्वर्णिम अवसर है क्योंकि उनके पास प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं होते। अतः 1 जुलाई से विद्यार्थियों को अपने क्लास में नियमित रूप से अवश्यमेव आना चाहिए और साथ ही पाठ्यक्रम(syllabus)और पुस्तक भी जरूर साथ में लाना चाहिए।। यदि विद्यार्थियों की प्यास और शिक्षकों की प्रतिभा के साथ दोनों का समर्पण भाव पढ़ने-पढ़ाने मे ंजुड़ जाए तो एक शैक्षिक क्रांति का सूत्रपात हो जाए। इसमें सरकार और समाज का सहयोग तनाव रहित अनुकूल वातावरण का निर्माण करने के लिए मिल जाए तो सरकारी संस्थान निजी संस्थानों पर भारी पड़ सकते हैं।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे- "शिक्षा-यज्ञ की सफलता की शुभकामना के साथ🙏🌹