"जीवनऔरअनिश्चितता" :जीवन की सारी खूबसूरती उसकी अनिश्चितता में है। कहां तो एक तरफ कन्या महाविद्यालय के प्राचार्य पद का भार आने वाला था और कहां एक झटके में खैरवाड़ा जाने का आदेश आ गया; तब मुझे-" प्रसन्नतां यां न गता अभिषेकत:, तथा न मम्ले वनवासदुखत:"- की पंक्ति याद आई जिसमें कहा गया है कि एक क्षण में राज्याभिषेक से दूसरे क्षण में वनवास गमन के आदेश ने श्री रघुनंदन को विचलित नहीं किया। मानव को मालूम ही नहीं होता कि उसका कल्याण किसमें है। यह तो परमात्मा ही जानता है। कभी-कभी तो परमात्मा आपको गहरे अंतर्द्वंद से एक झटके में मुक्त कर देता है। अतः जीवन को उसके सभी रंगों में आनंदपूर्वक जीना ही सच्ची आस्तिकता है। किसी भी रंग का अस्वीकार परमात्मा का ही अस्वीकार है-" अभी तृप्ति के पल,अभी प्यास के क्षण , अभी अश्रु के तो अभी हास के क्षण ; मिला साथ सुधा का विष का निमंत्रण। कहो कब किसने पुकारा समझ लूं , किसे जिंदगी का सहारा समझ लूं " - 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹