कस्तूरबा का जीवन दर्शन
July 1, 2019गांधी दर्शन समिति के समापन कार्यक्रम(1/7/19) में डॉ सर्वजीत दुबे द्वारा दिए गए भाषण के संक्षिप्त अंश-"कस्तूरबा का जीवन दर्शन" आज के नारी-सशक्तिकरण के समय में एक विशेष संदेश यह देता है कि-"नई सभ्यता का केंद्र प्रतियोगिता नहीं ,प्रेम हो।" आज स्त्रियां पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करने के फेरे में पुरुषोचित गुणों को विकसित करने लगी हैं। धन- पद-प्रतिष्ठा की दौड़ में यदि स्त्रियां पड़ जाती हैं तो नारी सुलभ प्रेम-समर्पण का उनका स्वाभाविक गुण शनै:- शनै: कमजोर पड़ जाएगा। ऐसी दुनिया से हृदयतत्व-संगीततत्व-काव्यतत्व खत्म हो जाएगा और दुनिया नीरस हो जाएगी। कस्तूरबा ने अपना संपूर्ण जीवन गांधीजी के महान उद्देश्यों के पीछे लगा दिया। प्रेम और समर्पण के बिना यह संभव ही नहीं था कि अपने घर में भी घूंघट में रहने वाली एक महिला गांधी के सार्वजनिक जीवन में इतनी सक्रिय भूमिका निभाती हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों स्त्रियां अपना सर्वस्व दान करने के लिए आगे आती हैं। नींव के पत्थर दिखाई नहीं देते। कस्तूरबा के प्रेम-त्याग-तपस्या की जड़ें जितनी गहरी होती गई, गांधी जी के सपनों का भारत उतना ही ऊंचा होता चला गया। सत्य-प्रेम-अहिंसा को गांधी राजनीति के धरातल पर इसलिए प्रतिष्ठित कर सके कि कस्तूरबा जैसी जीवनसंगिनी सदैव इन मूल्यों को जीती रही और इसके लिए उन्हें प्रेरित भी करती रही।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹