अविद्यालय
July 21, 2019" अविद्यालय " : 'विद्या ददाति विनयम्'की कसौटी को लेकर यदि हम अपने शिक्षा संस्थानों को गौर से देखें तो विद्यालय की जगह अविद्यालय और महाविद्यालय की जगह अ-महाविद्यालय लिखना उचित होगा। सर्वसार उपनिषद के अनुसार जो अहंकार देता है वह अविद्या है-" यो अभिमानं कारयति सा अविद्या ". आज के पढ़े-लिखे लोगों का अहंकार देखकर मन में एक सवाल उठता है कि आख़िर इस विद्या से इतना अहंकारी व्यक्तित्व कैसे निकला? खोजबीन करने पर यह बात सामने आई कि अज्ञ और विशेषज्ञ दोनों में एक प्रकार की विनम्रता है क्योंकि अज्ञ को यह पता है कि वह कुछ नहीं जानता और विशेषज्ञ को यह पता चल गया है कि थोड़ा कुछ जानने के बावजूद भी बहुत कुछ है जो कभी भी नहीं जाना जा सकता। लेकिन अल्पज्ञ की हालत "अधजल गगरी छलकत जाए" जैसी है। अहंकार सब कुछ जान लेने का दावा करता है।। जब तक शिक्षा के नाम पर सिर्फ डिग्री बांटी जाएगी तब तक अल्पज्ञ ही निकलेंगे। लेकिन जब मैंने कुछ ऐसे शिक्षा संस्थानों बिट्स पिलानी और आईसर(IISER)को गहराई से देखा तो पाया कि गहरे शोध में लगे हुए प्रोफेसर्स अत्यंत विनम्र और निरहंकारी हैं। तब मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि जो दिन-रात सिर्फ विद्या की साधना में लगे रहते हैं, वे कलाम साहब की तरह सीधे और सरल हैं। जब भारत विश्व गुरु था तब विशेषज्ञता की कद्र थी किंतु आज"Jack of all trades but master of none" का जमाना है। अब सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि एक तरफ विश्व गुरु बनने का सपना हम देख रहे हैं और दूसरी तरफ विद्या के उपासकों को विद्या की साधना में लगे रहने के लिए न समय दे रहे हैं और न व्यवस्था। इसके विपरीत उन्हें अन्य कई शैक्षिकेतर दायित्वों के बोझ तले दबाकर अल्पज्ञ रहने पर मजबूर कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में दो ही विकल्प हैं कि या तो हम अपने शिक्षा संस्थानों के नाम में परिवर्तन कर लें या विद्या की अहर्निश साधना की परिस्थिति बना दें जिससे विशेषज्ञ निकलें जो विनम्र और निरंहकारी हों।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹