" Art of Living बनाम Art of Leaving " : भारत एक अद्भुत देश है जहां 60 वर्ष के बाद सरकारी सेवा से निवृत्ति(retirement) मिल जाती है जबकि सरकारी सेवा अपेक्षाकृत आराम और निश्चिंतता की सेवा मानी जाती है; लेकिन राजनीतिक सेवा से निवृत होने की कोई आयु निर्धारित नहीं है जबकि इसमें भाग-दौड़, छल-प्रपंच का कोई अंत नहीं। भारतीय संस्कृति की दुहाई देनेवालों को यह याद रखना चाहिए कि 50 वर्ष के बाद वानप्रस्थ आश्रम का विधान है। घर हो या बाहर; बहुत सारी समस्याओं की जड़ में मेरी समझ में निवृत्ति का अभाव प्रमुख कारण है। प्रवृत्ति के दौर में काम,क्रोध,लोभ,ईर्ष्या महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और गहरे जानने वाले बताते हैं कि इनकी भी एक निश्चित मात्रा संसार में उन्नति के लिए जरूरी है। किंतु 50 वर्ष के बाद भी ये ही मूल भाव जड़े जमाए रखते हैं तो नई पीढ़ी के अवसर बहुत सीमित हो जाते हैं। दूसरी तरफ पुरानी पीढ़ी की प्रकृति विकृत होने लगती हैं। ओशो कहते हैं कि शिक्षा जगत मेंArt of leaving का समावेश हो और राजनीतिक जगत में तो यह अनिवार्य प्रशिक्षण का हिस्सा हो। क्योंकि जीवन के प्रारंभिक 50 वर्ष तक काम-क्रोध-लोभ-ईर्ष्या का दंश झेलते-झेलते मानव धीमे-धीमे करुणा-प्रेम-दया-दान की तरफ उन्मुख होने लगता है। इससे जीवन की गौरव-गरिमा बढ़ती है। धरती पर चलने और दौड़ने की निरर्थकता के बाद आकाश की तरफ आंखें उठने लगती हैं। लेकिन राजनीतिक मन चाहता है कि पद पर रहते हुए मरूं तो हमारा स्वर्गीय होना भी दुनिया को पता चल जाएगा। लेकिन जिस दुनिया को छोड़ना ही है ,उस दुनिया को पता चलाने की यह सोच क्या है? - 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹