_सर्वे भवंतु_ सुखिन:
August 14, 2019स्वतंत्रता का रक्षाबंधन पर्व मनाने के लिए एक उदार और सहिष्णु दर्शन की जरूरत आज देश महसूस कर रहा है।" सर्वे भवंतु सुखिन:"की दृष्टि और सूफियों की दृष्टि- "इसक अलह की जात है,इसक अलह का अंग; इसक अलह औजूद है ,इसक अलह का रंग "- दोनों समान है। अस्तित्व से और मनुष्य से प्रेम करने वाले लोग ही आज स्वतंत्रता की सही मायने में रक्षा कर सकते हैं ।। भारत दर्शन-प्रधानऔर धर्म-प्रधान देश था,दुर्भाग्य से आज राजनीति-प्रधान हो गया है। ओशो ने कश्मीर में अपना आश्रम खोलने देने के लिए सियासतदानों से अपील की थी। काश!वो अपील स्वीकृत हो जाती तो वहां की धरती पर ध्यान और प्रेम की भाव-धारा बहती।दुर्भाग्य से जन्नत को जहन्नुम बनाने के लिए परिस्थितियां बन गई। आज सूफियों के प्रेम और विराट हिंदू धर्म की भक्ति धारा कश्मीर से कन्याकुमारी तक बहाने की जरूरत है।यह उत्तरदायित्व हर भारतीय को लेना होगा।उत्तरदायित्व की जड़ जितनी गहरी जाती है ,उतनी ही ऊंची स्वतंत्रता का धड़ पहुंच पाती है। भारत का मूल केंद्र प्रेम है-" जहां कहीं एकता अखंडित ,जहां प्रेम का स्वर है ; देश-देश में वहां खड़ा, भारत जीवित भास्वर है ।"इसी प्रेम से स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है। और प्रेम के रक्षाबंधन को हर कोई दिल से स्वीकार करता है क्योंकि जो भौंरा कठोर काठ को काटकर निकल भागने की सामर्थ्य रखता है ,वही फूल की कोमल पंखुड़ियों में बंद होना दिल से स्वीकार कर लेता है।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामना सहित🙏🌹