शिक्षक की टीस
September 4, 2019"शिक्षक की टीस" शिक्षक के जिस गौरव- गरिमा की याद दिलाई जाती है, उसके स्मरण मात्र से अपनी पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है।शिक्षा और शिक्षक की बदहाली आज जगजाहिर है।शिक्षक को भगवान मानने वाली संस्कृति में ऐसी व्यवस्था बनी है कि उसे इंसान का जीवन भी बामुश्किल उपलब्ध हो पा रहा है। आज शिक्षक एक जिंदा घुटन से ज्यादा कुछ भी नहीं।। सरकारी या निजी क्षेत्र हो;शिक्षक की भूमिका ऊपर से आने वाले आदेशों के पालन मात्र की हो गई है।स्वाध्याय और चिंतन-मनन का उसे अवकाश या अवसर ही नहीं। स्वतंत्रता और प्रेम के दो पंखों से ज्ञान के आकाश में उड़ने वाले शिक्षक रूपी पंछी के पैरों में परतंत्रता और प्रतियोगिता की जंजीरें डाल दी गई हैं। आत्मीय संबंध को व्यापारिक संबंध में तब्दील कर चुकी व्यवस्था में शिक्षा की दुकानें खुल गई हैं,जिसमें शिक्षक रूपी व्यापारी विद्यार्थी रूपी ग्राहक को भुगतान के आधार पर नियोक्ता के निर्देशानुसार ज्ञान का सामान उपलब्ध कराता है।सुपर थर्टी के जैसे प्यासे विद्यार्थी और आनंद जैसे समर्पित शिक्षक इस अंधेरी रात में आशा की एक किरण के समान है ।अतः मेरे हृदय की पीड़ा यह है कि-" * शिक्षा की नई मशाल का एक बड़ा गम है ; धुआं बहुत ज्यादा है , लौ बहुत कम है* ".'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे 🙏🌹