ट्राइबल फिलॉसफी में प्रकृति सबकुछ :-शैक्षिक-वैचारिक पृष्ठभूमि की उत्तम अवस्था में दर्शन का जन्म होता है, इस मायने में भील समाज का कोई दर्शन प्रमाणिक रूप से उपलब्ध नहीं है। किंतु प्रकृति के बीच पल रहे और बढ़ रहे उनके जीवन को 22 वर्षों से देखने के बाद पर्यावरण संकट के इस युग में *जनजातियों का जीवन-दर्शन मुझे अन्वेषणीय और अनुकरणीय प्रतीत होता है। जिस समय में महानगर मुंबई में मेट्रो के लिए पेड़ों को काटा जा रहा हो, उस समय में पेड़ों और जंगलों के लिए जीने वाले लोग मार्गदर्शक का स्थान स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं। पर्यावरण विषय की पढ़ाई के लिए जहां कागज की बर्बादी की जाती हो, जो कागज अनेक पेड़ों की बलि चढ़ाकर तैयार किए जाते हैं;वहां पेड़ों के साथ जीवन जीनेवाले लोगों को शिक्षित और विकसित माना जाना चाहिए, न कि सिर्फ डिग्री पा जानेवालों को। तथाकथित विकास और शिक्षा के नाम पर प्रकृति प्रेमी लोगों का सहज- सरल जीवन जटिल और पथरीला बनाया जा रहा है। मुझे लगता है कि इस प्राकृतिक-जीवन विरोधी विकास और शिक्षा पर विचार किया जाना चाहिए। आदिवासियों का प्रेम भी प्रमाणिक होता है और गुस्सा भी किंतु महानगरवासियों के जीवन में प्रमाणिकता नहीं मिलती। अमेजन के वर्षावनों में आग की घटनाएं जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को निकाले जाने की साजिश का हिस्सा है।देवभूमि हिमाचल और उत्तराखंड में हो रहा भूस्खलन और भीषण तबाही पुकार- पुकार कर कह रही हैं कि " प्रकृति की ओर लौटो ". एक नई शिक्षा और विकास की एक नई समझ की आवश्यकता है जो पेड़ों को काटकर उसके बारे में प्रयोगशाला में ज्ञान नहीं प्राप्त करेगी- " वृक्षों के उपकार को हमने पूरी तरह चुका दिया , काटकर उसे मूल ** से घर के फर्नीचर पर सजा दिया "- बल्कि पेड़ों के बीच जीकर प्रेम से उनके बारे में सब कुछ जानने के लिए बुद्धि का उपयोग करेगी। पेड़ काटने से बने कागज पर वृक्ष बचाने का और आदिवासी दर्शन/संस्कृति बचाने का संदेश लिखने से पेड़ व आदिवासी संस्कृति नहीं बचेगी। अतः लेखनी को और वाणी को विराम देकर बांसवाड़ा की खूबसूरती का दर्शन करें तो भील दर्शन अपने आप स्पष्ट हो जाएगा।-'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹