शिक्षक को शिक्षाकर्मी बना डाला
September 14, 2019यथार्थ में हिंदी: विविधता में एकता तभी तक बनी रहती है, जब तक विविध धर्म,क्षेत्र,जाति,भाषा में से किसी एक को बहुत ज्यादा प्रमुखता नहीं दी जाती।लेकिन व्यवहारिक और राजनीतिक दुनिया में संख्या और शक्ति के आधार पर कोई एक प्रमुख बन जाता है;और अन्य गौण।आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है।हिंदी को ज्यों ही राजभाषा और राष्ट्रभाषा की विशेष पदवी से नवाजा गया त्यों ही हिंदी के समर्थक राज्य भी अपनी राज्य-भाषा के आधार पर उसके विरोध में खड़े हो गए। हिंदी-हिंदु-हिंदुस्तानी के नारे को लेकर चलने वाली पार्टी जब सत्ता में हो,तो उस समय भी भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा में हिंदीभाषा के माध्यम से चयनित उम्मीदवारों की संख्या 10%भी नहीं होना आश्चर्य की बात है। यह यथार्थ और नारों के बीच बढ़ती खाई को सबसे स्पष्ट रूप से आंखों के सामने रखती हैं।आखिर क्या बात है कि हिंदीभाषा के कट्टर समर्थक समस्त लोगों के बच्चे इंग्लिश मीडियम के स्कूल मेँ शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?कारण है कि आज की शिक्षा का उद्देश्य मात्र आजीविका प्राप्त करना है। संस्कृत व हिंदी के प्रति भावनात्मक लगाव के कारण कितना भी उसका गौरव-गान हम करें किंतु वर्तमान तो इंग्लिश का है। ऋषियों की भाषा संस्कृत कंप्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त वैज्ञानिक भाषा हो सकती है और स्वतंत्रता को जन- आंदोलन बनाने में हिंदी की सबसे बड़ी भूमिका हो सकती हैं किंतु सूचना क्रांति के इस तकनीक प्रधान युग में सबसे बड़ा योगदान इंग्लिश भाषा का है,इस सत्य को स्वीकार करना हिंदी दिवस की सबसे बड़ी प्रासंगिकता होगी।। अन्यथा जिस प्रकार शिक्षकों की महिमा को आसमान पर चढ़ाकर हमने जमीन पर चलने लायक भी न छोड़ा-"शिक्षक को शिक्षाकर्मी बना डाला"उसी प्रकार हिंदी का ज्यादा गौरव-गान करके यथार्थ से मुंह न मोड़ा जाए। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा सरकारी प्रयास ओस की बूंदों के समान है, जिससे न फसलें उगती हैं और न प्यास बुझती है-" फसलें न उगेगी, न कभी प्यास बुझेगी , ये ओस की बूंदें हैं , ये बरसात नहीं है । कहते हैं कोई शहर में अब भी है वफादार ,हालांकि मेरी उससे मुलाकात नहीं है ".-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹