न रोटी कमाना सिखा पाई और न जीवन जीना सिखा पाई , यह हमारी शिक्षा आज किस मुकाम पर ले आई
September 15, 2019रोजगार की नहीं, योग्यता की कमी यह ऐसा सत्य है,जो अब स्पष्ट रूप से भारत की आंखों के सामने नाचने लगा है।आखिर जिम्मेवारी किसकी?-शिक्षक की, शिक्षार्थी की, सरकार की या समाज की। मैकाले को क्लर्क चाहिए थे और उसने शिक्षा पर आवंटित राशि का उपयोग इस प्रकार से किया कि ब्रिटिश सरकार चलाने के लिए वैसी योग्यता वाले व्यक्ति उपलब्ध हो गए। मैकाले पर ज्यादा दोषारोपण करने वाले लोगों के अनुसार तो यह जिम्मेदारी नीति-निर्माताओं की बनती है। विद्यार्थी को पता नहीं कि मंजिल क्या है, शिक्षक शिक्षा का रास्ता चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं और समाज मूकदर्शक बना हुआ है। शिक्षा-नीति पर बहस कराई जाती है और उसमें सबको शामिल कर लिया जाता है। देखने पर तो यह कदम बहुत अच्छा लगता है किंतु गहरे में जानने वाले शिक्षाविद् कहते हैं कि यह बहुत खतरनाक है क्योंकि देश-काल की संपूर्ण जरूरत को समझ कर वर्तमान की समस्याओं और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर शिक्षा-नीति बनाने की सामर्थ्य, आंकड़े और दूरदर्शिता सबके पास नहीं होती। एडमिशन,इलेक्शन , एग्जामिनेशन को प्रमुखता देकर शिक्षालय कार्यालय ज्यादा बना दिए गए हैं।जब विद्यार्थी शिक्षालय से दूर हो गए तो अब प्रतियोगिता कोचिंग और कौशल विकास के केंद्र के रूप में उच्च शिक्षा को ढालकर फिर से विद्यार्थियों को आकर्षित करने के उपाय किए जा रहे हैं।किंतु इस सत्य से आंख चुराई जा रही है कि शिक्षकों की भारी कमी और उनका शिक्षकेतर कार्यों में ज्यादा उपयोग के साथ बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप और आउटडेटेड सिलेबस ने विद्यार्थियों को कॉलेजों से दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।। शिक्षा को जब तक राष्ट्र का सबसे प्रमुख विमर्श बनाकर ध्यान नहीं दिया जाता तब तक स्थितियां बद से बदतर होती जाएगी।अतः मार्गदर्शक ऐसी शिक्षा-नीति बनाएं जो देश-काल की जरूरतों के अनुरूप हो, न कि किसी खास विचारधारा के। उच्च-शिक्षा में गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाए अन्यथा मुझे तो चारों तरफ से यह एक ही आवाज गूंजती नजर आ रही है- "न रोटी कमाना सिखा पाई और न जीवन जीना सिखा पाई , यह हमारी शिक्षा आज किस मुकाम पर ले आई ".-शिष्य गुरु संवाद से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹