सेवकों से डर ? क्योंकि तथाकथित सेवकों की दृष्टि तो मेवा पर है और सेवा महज एक फंदा है।गांधीजी के लिए सेवा मार्ग भी था और मंजिल भी। किंतु आज सेवा मार्ग बन गया है ,मेवा रूपी मंजिल_ तक पहुंचने के लिए। वृक्ष यदि फलों से लद जाए तो पकने के बाद गिरेंगे अन्यथा डालें सड़ने लगती हैं-" ऋतु के बाद फलों का रुकना , डालों का सड़ना है ।मोह दिखाना देय वस्तु पर , आत्मघात करना है।। "- बापू की सेवा हृदय में प्रेम के भर जाने से शुरू होती थी ,अतः वे अपने विरोधियों को भी प्रेम कर सके क्योंकि उनका अंतर मानता था - पाप को हटाओ , पापी को नहीं।। आधुनिक मस्तिष्क प्रधान शिक्षा व्यवस्था में हृदय रूपी फूल के खिलने की कोई गुंजाइश नहीं है।अतः हम उस मशीन का निर्माण कर रहे हैं ,जिसमें"Use and throw"के भाव को अंदर में रखकर सेवा किया जाता है। Online वाली शिक्षा व्यवस्था में जब तक मोहन जैसा Heartline वाली शख्सियत जगह-जगह नहीं दिखती तब तक गौ सेवा और राष्ट्र सेवा के नाम पर हिंसा करने वाली भीड़ बढ़ती जाएगी।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹