यह किस मुकाम पर ले आई जिंदगी मेरी: सोचा था जिंदगी भर पढ़ने-पढ़ाने के बाद जो विचार परिपक्व हुए हैं,उन्हें सेवानिवृत्ति के पश्चात कलमबद्ध कर दूंगी। वर्षों की साधना का फल जब लोगों के सामने मेरे लेखन के रूप में आएगा तो जिंदगी सार्थक हो जाएगी और ऋषि- ऋण से भी मैं मुक्त हो सकूंगी। लेकिन निर्मल विचारों की धनी वाणीसाधिका भाग्य की उतनी धनी नहीं निकली। अचानक कॉलेज मंच पर प्राचार्या के रूप में उद्बोधन देते समय भाव और विचार के बीच कशमकश से मस्तिष्क का कोई नाजुक सा तंतु हिल गया। सारी कायनात बदल गई।जो धाराप्रवाह घंटों अपनी मंत्रमुग्ध करने वाली वाणी से श्रोताओं को बांधे रहती थी,वह आज कलम शब्द भी पढ़ने में असमर्थ हो गई। चिकित्सकों ने कहा कि फिर से शून्य से शुरू करना होगा अर्थात् वर्णमाला के अक्षरों को मिलाकर पढ़ने का अभ्यास बच्चों की तरह करना होगा। जो पुस्तकों के बिना एक क्षण नहीं रह सकती थी,उसे अब अक्षरों को पढ़े बिना जिंदगी बितानी पड़ रही है -" वर्षों की कठिन साधना के साथ प्राण नहीं क्यों लेते हैं ; अब किस सुख के लिए मुझे धरती पर जीने देते हैं ? "-इतनी जुझारू और संकल्पशाली व्यक्तित्व से जब यह सुनने को मिला कि अब जीने का मकसद क्या है ?जो गहरी अनुभूतियां थी,उसकी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य एक घटना ने छीन ली; जिस गीत को गाने की तैयारी की थी, अचानक वक्त ने कंठ अवरुद्ध कर दिए। सदैव आशा और उत्साह से लबरेज महिला के उनके निराशा से भरे वचन मेरे दिलो-दिमाग में गूंज रहे हैं और यही पूछ रहे हैं- हे परमात्मा! जिंदगी क्या है?-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹