" राजनीतिक एकता से भावनात्मक एकता तक"- एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है संकुचित दृष्टि। "आध्यात्मिक दृष्टि वाला भारत वसुधैव कुटुंबकम की घोषणा इसलिए कर सका क्योंकि प्रत्येक जीव में आत्मा को मानता है जो कि परमात्मा का अंश है। पश्चिम में राष्ट्रवाद ने आदमी पर भिन्न-भिन्न लेबल लगाना शुरू किया- जर्मन,यहूदी,फ्रांसीसी, पुर्तगीज, ब्रितानी इत्यादि। इस राजनीतिक दृष्टि के कारण आपस में आदमी को लड़ाना आसान हो गया-" आखिर इंसान तंग सांचों में ढला जाता है क्यों?आदमी कहते हुए अपने को शर्माता है क्यों?? -* क्योंकि लेबल का ठप्पा मन में गहराई तक बैठ गया। परिणाम में दो विश्वयुद्ध मिले। भारत का आत्मवादी चिंतन राष्ट्रवाद से आगे ब्रह्मांडवाद तक ले जाता है। आज पुनः " फिर रहा है आदमी भूला हुआ,भटका हुआ।एक न एक लेबल हर एक माथे पर है लटका हुआ ।लौह पुरुष_ ने राज्यों के लेबल हटाकर राजनीतिक दृष्टि से भारत को राष्ट्रीय एकता प्रदान की। अब हम अपने ऋषियों की आध्यात्मिक दृष्टि अपनाकर राजनीतिक एकता को भावनात्मक एकता में बदल सकते हैं और राष्ट्रवाद से आगे ब्रह्मांडवाद की राह जगत को दिखा सकते हैं। बस जरूरत है अपनी सीमाओं के पार जाने की।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹