प्रतिभाओं का देश भारत प्रतिभा को संभालने और निखारने की कला भूल गया है। जीनियसों के जीनियस डॉ.वशिष्ठ नारायण सिंह की तुलना आर्यभट्ट से की गई। गंगा किनारे बसे मेरे गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर उनका घर घास-फूस और खप्परों का बना था। किंतु बालक वशिष्ठ की प्यास और प्रतिभा ऐसी थी कि बड़े विश्वविद्यालय के महलों में भी न समा सकी।गणित सुलझाने की ऐसी धुन की गंगा के किनारे बालू के रेत उसकी गवाही देते थे । किशोरावस्था में पूरा खेत उनके उंगलियों से बनाए गए अंको से ऐसे पटा रहता था ,जैसे किसी विश्वविद्यालय का ब्लैक बोर्ड। पटना विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज में प्रथम वर्ष के छात्र ने जब प्रोफेसर को उलझाने वाले सवाल को अनेक तरीकों से सुलझा दिया तो नासा के प्रो. केली PU कुलपति के साथ विशेष मीटिंग कर विशेष प्रावधान द्वारा उन्हें अमेरिका ले गए। वहां नासा के अंतरिक्ष कार्यक्रम में उनके अद्भुत योगदान को देखकर स्वयं उनके ऊपर खोजबीन होने लगी।प्रो. केली ने उन्हें अपना संबंधी बनाकर अमेरिका में बसाना भी चाहा।किंतु स्वदेशप्रेम और अपना परिवार उन्हें भारत खींच लाया।एक तरफ मस्तिष्क में आकाश के घूमते नक्षत्र उन्हें सोने नहीं देते थे तो दूसरी तरफ संसार,समाज और सरकार की उलझनें उन्हें जीने नहीं देती थी। अपनी कल्पनाओं को साकार रूप देने के लिए पर्याप्त संसाधन और उचित परिवेश नहीं मिलने के कारण वे पागल हो गए।अपने परिजनों से बिछड़कर कई वर्षों तक सड़कों पर पड़े हुए जूठे पत्तल चाटकर गुजारे। जब वापस घर लाया गया तो भी उनका मस्तिष्क किसी गणित को सुलझाने के प्रयास में लगा रहता था। किताब,कॉपी और पेंसिल के साथ रहने वाले इस जुनूनी के पीछे कई विदेशी पत्रकार इनकी बड़बड़ाहट को भी नोट किया करते थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि वे कुछ अद्भुत सिद्धांत को बताने की कोशिश कर रहे हैं।। काश!नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी की तरह वशिष्ठ भी समान रुचि का जीवन साथी पा लेते और प्रतिभाओं को नई ऊंचाइयां देने वाला स्थान नासा न छोड़ते तो एक प्रतिभा पागल होकर नहीं मरती।। एक समय था जब देश प्रतिभा के पल्लवित और पुष्पित होने के अनुकूल था क्योंकि स्पेशलाइजेशन पर जोर था।आज वही देश प्रतिभा-पलायन को रोक नहीं पा रहा है क्योंकि"Jack of all trades but master of none" के रास्ते पर चल रहा है। -' शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹