डा. वशिष्ठ और हॉकिंस- वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना संविधान के मौलिक कर्तव्यों में परिगणित है। किंतु आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक और गणितीय प्रतिभा के धनी डॉ. वशिष्ठ सरकारी उदासीनता के कारण एक पागल की जिंदगी जीकर मरे।दूसरी तरफ स्टीफन हॉकिंस को कई खतरनाक बीमारियों ने जकड़ा। किंतु उनको हर प्रकार का ऐसा सहयोग मिला कि वे जगत को वह सब कुछ दे सके जो एक वैज्ञानिक का जीवन दे सकता था। हॉकिंस के जो-जो अंग खराब होते गए,उनको वैज्ञानिक उपकरणों का विकल्प देकर उनकी प्रतिभा का सदुपयोग कर लिया गया। दूसरी तरफ डा. वशिष्ठ की सामान्य सी बीमारी सिजोफ्रेनिया इलाज के अभाव में और खराब होती चली गई। एक राजनेता की मृत्यु पर मीडिया दिन-रात उसका कवरेज देता रहता है किंतु एक महान वैज्ञानिक का शव एंबुलेंस का इंतजार कर रहा था,यह सरकार को बहुत देर से पता चला। अब जरा गौर से हमसब मिलकर शांतिपूर्वक सोचें कि Political tourism वाले परिवेश में राजनीतिक सोच ज्यादा मजबूत होगी या वैज्ञानिक सोच।विश्वगुरु का सपना देखने वाला देश वैज्ञानिक और गणितीय फार्मूले को विचार-विमर्श का केंद्रबिंदु बनाता है ,सरकार बनाने के फार्मूले को नहीं। राममंदिर निर्माण हेतु जल्द ट्रस्ट बने यह सबकी मनोकामना है किंतु गुरु वशिष्ठ जैसी प्रतिभा और दूरदृष्टि वाला वैज्ञानिक के लिए भी कोई ट्रस्ट बने ताकि फिर से कोई ऐसा हीरा हमारी उपेक्षा का शिकार न हो जाए। राजनीतिज्ञों के झूठे-वादे और खोखले-शब्दों के कारण हिंदुस्तान का जो चेहरा उभर रहा है,वह धर्मांधता और रूढ़िवादिता वाला है;क्योंकि " दुआ तो जीने की करते हैं , किंतु दवा तो मरने की देते हैं। "-'शिष्य- गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹