गांधी के सपनों का भारत मार्ग और मंजिल के ज्ञान के बिना नहीं बन सकता।संविधान की प्रस्तावना मंजिल है और मार्ग है मौलिक-कर्तव्य। प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्य रूपी मार्ग का ज्ञान होना चाहिए और उसका सतत ध्यान भी होना चाहिए तब प्रस्तावना रूपी मंजिल वास्तविकता बन पाएगी। किंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि मूल- कर्तव्य और प्रस्तावना सामान्य जनों को तो छोड़िए,अच्छे पढ़े-लिखे लोगों के भी ध्यान में नहीं है।ऐसे में शिक्षाजगत से यह अपेक्षा की जाती है कि प्रत्येक विद्यार्थी को प्रस्तावना तथा कर्तव्य के बारे में सरल व सरस तरीके से बोध जागृत करे। संविधान की भाषा कानूनी-भाषा है और उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए साहित्य का सहारा चाहिए। आज भारत एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है- " भीड़ भटके रास्तों पर दौड़ती है,जब सफर का रहनुमा खामोश होता है "-शिक्षक जीवनरूपी सफर का रहनुमा(मार्गदर्शक) है,उसकी खामोशी जोश से भरी युवाशक्ति को होश से वंचित कर देगी। अतः प्रत्येक शिक्षक मार्ग और मंजिल का ज्ञान देकर जोश के साथ होश भी बढ़ाए। इस दृष्टि से GGTU के प्रथम दीक्षांत-समारोह में माननीय कुलाधिपति महोदय का यह आह्वान कि प्रस्तावना और मौलिक-कर्तव्य सबकी जुबान पर होना चाहिए, अनुकरणीय और अनुशरणीय है।इस दिशा में हम सबको मन-वचन-कर्म से बहुत कुछ करना होगा।'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹