अगुन, अरूप,अलख, अज जोइ ; भगत प्रेम बस सगुन सो होई
January 3, 2020कवि Vs सत्ता -कवि का जगत भाव-प्रधान होता है-'जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'..आकाश में उमड़ती-घुमड़ती बदली में कोई अपने आराध्यदेव का आकार देख सकता है तो कोई निराकार-"अगुन, अरूप,अलख, अज जोइ ; भगत प्रेम बस सगुन सो होई"। जब विचारक किसी कविता पर विचार करने लगता है तो उसमें तारतम्यता और संगतता ढूंढने लगता है।उसे मालूम ही नहीं कि उसी बदली को हवाएं कुछ देर में और आकार दे देगी या उड़ा कर कहीं और ले जाएगी। आज फैज साहब जिंदा नहीं है कि उनसे पूछा जाए कि आपके इस शब्द का मतलब क्या है और मकसद क्या है?उनके हृदय में बगावत के भाव उठे और शब्द की पोशाक पहन लीऔर यह कविता हर बगावती के हृदय में प्रवेश कर गई और जुबान पर आ गई। हृदय के जगत में मस्तिष्क का प्रवेश मत कराओ तो अच्छा!क्योंकि हृदय आकाश में उड़ता है और मस्तिष्क जमीन पर घिसटता है-" इश्के-मोहब्बत की तासीर तो देखो , अल्लाह भी मजनू को लैला नजर आता है" .'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹