विवेक बिना आनंद कहां ?-युवाओं का देश भारत अपने महापुरुषों के रास्ते पर चलने में विफल रहा है अन्यथा विवेकानन्द के देश में विवेक और आनंद इस तरह गायब नहीं हो सकता था।वे सिर्फ तन से ही युवा नहीं थे वरन मन से भी जवान थे।उनके विचार इतने विराट और कल्याणकारी थे कि "हिन्दू"शब्द महानता और उदारता का पर्याय बन गया था। रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर लाखों युवक-युवतियों को उन्होंने मानव सेवा में लगा दिया। किंतु आज वे सेवाभावी लोग जो हिंदुत्व और विवेकानन्द के आदर्श को चुपचाप जी रहे हैं,मुख्य रूप से चर्चा में नहीं है।और जो उनकों साधन बना रहे हैं ,वे मुखर हैं। इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ने विवेकशील और सृजनशील लोगों को पर्दे के पीछे कर दिया है।पद-पैसे-प्रतिष्ठा को छोड़कर दिन-रात सेवा में रत रहते हुए विवेक और आनंद में जीने वाले लोगों को मैंने आश्रमों में देखा है किंतु नरेंद्रनाथ दत्त की तरह सत्य उनकी मंजिल है, सत्ता नहीं।-'शिष्य-गुरु संवाद' से डा.सर्वजीत दुबे🙏🌹