विष पीने की कला में माहिर महायोगी का यह देश आज विष वमन करने में इतना माहिर कैसे हो गया?सिर्फ समुद्रमंथन से निकले हुए विष को ही नीलकंठ ने नहीं पिया बल्कि गृहस्थ जीवन में उनकी जो भी विषम परिस्थितियां थीं,सबको वे पचा गए। एक तो खुले आकाश के नीचे पर्वत पर निवास फिर भी वे कहते हैं- न छप्पर है, न दीवारें , मगर बेघर नहीं है हम ; खुला आवास है, आवास को आवास रहने दो ". वे स्वयं और उनका परिवार जैव-विविधता के संरक्षण का अप्रतिम प्रतीक हैं। पर्वत,नदी,जंगल से लेकर सभी प्रकार के वन्यजीवों तक को संरक्षित और संवर्धित करने में उनका कोई सानी नहीं।इतनी विषम और विविध परिस्थितियों में किसी की प्रकृति विकृति की ओर जाने लग सकती है किंतु उन्होंने तो एक नई संस्कृति को जन्म दिया ; वे आशुतोष कहलाते हैं- "सुनहरी बात होगी और मौसम भी हरा होगा , यही विश्वास है विश्वास को विश्वास रहने दो" प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने ध्यान की शक्ति और परमात्मा की भक्ति के कारण वे महादेव हो गए- नमामि शमीशान निर्वाणरूपं ..।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे महाशिवरात्रि की शुभकामनाओं सहित🙏🌹