व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं है , व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं है
February 25, 2020परीक्षा और तनाव मानव जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। मन दूसरों से प्रमाणपत्र पाना चाहता है इसलिए परीक्षा जरूरी है और मन दूसरों से तुलना करता रहता है इसलिए तनाव भी अनिवार्य है। किंतु ये व्यर्थ नहीं हैं-" व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं है , व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं है" परीक्षा और तनाव को सार्थक बनाया जा सकता है,यदि व्यक्ति स्वयं से ही प्रतिस्पर्धा करे और अपने सद्गुणों को आगे बढ़ाने के लिए तनाव का सदुपयोग करे। विद्यार्थी के लिए परीक्षा और तनाव तोड़ने वाला बन सकता है, यदि उसके मां-बाप भी प्रेम की जगह प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाएं। जब मां-बाप दूसरे की तुलना में अपने बच्चे को नहीं देखेंगे तो बच्चा भी धीमे-धीमे गला काट प्रतियोगिता की दुनिया से बाहर आ जाएगा। किंतु जब बच्चे के साथ-साथ परिवार भी तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ावा दें तो विद्यार्थी के टूटने के अवसर ज्यादा बढ़ जाते हैं।। मैंने ऐसे मां-बाप देखे हैं जो विद्यार्थी के परीक्षा के समय में उसके तनाव को अपने प्रेमपूर्ण वचन और आचरण से बहुत कम कर देते हैं।फिर विद्यार्थी अपने कर्म पर एकाग्र होकर अपना बेहतर से बेहतरीन प्रदर्शन करता है और फल परमात्मा की इच्छा पर छोड़ देता है। ऐसे परिवार वाले विद्यार्थी के जीवन में असफलता उसे सीख देने वाली होती हैं और सफलता उसे अधिक विनम्रता प्रदान करती हैं-" बांध दो सबको सुरीली तान में तुम , बांध दो बिखरे शुरू को गान में तुम "- परीक्षार्थी यदि परीक्षा और उसके भारी तनाव से गुजर रहा है तो मां-बाप और परिवार उसके अगल-बगल प्रेम का वातावरण बनाएं।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹