हिये तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनि
February 27, 2020बोली एक अनमोल है जो कोई बोलै जानि- करोड़ों लोग दहशत की चपेट में आ जाएंगे, लाखों बच्चों का भविष्य परीक्षा के टाले जाने से प्रभावित हो जाएगा, हजारों लोग दो जून की रोटी जुगाड़ करने में असमर्थ हो जाएंगे, सैकड़ों घरों में मातम पसर जाएगा,स्त्रियां विधवा हो जाएंगी, बच्चे अनाथ हो जाएंगे,घर का चिराग सदा-सदा के लिए बुझ जाएगा- क्या कभी ख्याल में भी आ सकता है कि इतने बड़े विनाश के पीछे मुख से निकली वह बोली है, जिसको हृदय रूपी तराजू पर तौला नहीं गया। नफरत की आग में कितने रतन जलकर खाक हुए इसका आकलन करना मुश्किल है लेकिन यह आकलन मुश्किल नहीं है कि आग जबान ने लगाई है । इसी जबान की मिठास से संतों और सूफी फकीरों ने दिलों में प्रेम जगाया है, गंगा-यमुनी तहजीब की धारा बहाई है, झोपड़ियों में भी नृत्य-गान का उल्लास उमगाया है।उनके साहित्य और भाव ने पीढ़ियों को सहृदय बनाया है।अपनी इतनी बड़ी विरासत को चंद बदजुबान लोगोँ की साजिश का शिकार बनने नहीं दिया जा सकता। बोलने की आजादी सबको है लेकिन उन्हीं को बोलना चाहिए जो कबीर के इस संदेश को समझते हों- " हिये तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनि ". 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹