" हैवान-इंसान-भगवान "क्रोध-घृणा की आग में दिल्ली जली है,इसके सबूत गली-गली व दर-दर मिल रहे हैं।दंगाइयों ने जिस बेरहमी से इंसानों की हत्या की है और बच्चों के स्कूल तक को जलाया है,उसे देखकर लगता है कि मनुष्य पशु है ; और वह भी हिंसक ।दंगाइयों की भीड़ किस हद तक नीचे गिर सकती हैं, इसे देखकर रातों की नींद गायब हो गई। धर्म ,जाति का लेबल लगाकर व्यक्ति भीड़ में खो जाता है; उसकी आत्मा मर जाती है और वह बद से बदतर हो जाता है। जले हुए सामान और मरे हुए इंसान चीख- चीख कर इस बात का सबूत दे रहे हैं कि- " इंसान नहीं,हैवान है ". दूसरी तरफ प्रेम व करुणा से भरे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों की जान बचाई हैं। अपने ही धर्म-जाति के विरुद्ध खड़े होकर एक इंसान को सिर्फ इंसान के रूप में देखा है।भयभीत और संकटग्रस्त इंसानों के लिए ऐसे लोग भगवान के रूप में उभर कर आए हैं। ऐसे भगवानों की भीड़ नहीं बनती। बामुश्किल दो-चार लोग अपनों को खो चुके परेशान लोगों के परिजनों को न सिर्फ खाना-पानी का इंतजाम कर रहे हैं बल्कि शवों को ढूंढने में दिन-रात एक किए हुए हैं। ऐसे दृश्यों और लोगों को देखकर मन दूसरी अति पर चला जाता है और बोल उठता है कि-" इंसान नहीं,भगवान है ". हैवान-इंसान-भगवान इन 3 शब्दों ने मेरे दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख दिया है क्योंकि ये तीनों रूप मेरे अंदर ही दिखाई देने लगे हैं-" बैठे-बैठे बोध रहा हूं , मैं तो खुद को शोध रहा हूं "- कि मैं कौन हूं? 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹