इतने गीत दे दिए तुमने सारे दर्द वसूल हो गए , तेरे दिए हुए पीड़ा के यह पल भी अनुकूल हो गए
March 6, 2020सर नहीं रहे- अचानक कल खबर आई कि जिनके जीवन का अधिकांश लम्हा विद्या और विद्यार्थियों के साथ ही बीतता था,वे सर आज दुनिया को छोड़ कर चले गए। किंतु वे वो यादें भी छोड़ गए कि पीजी फिलॉसफी क्लास में विद्यार्थियों के आने के पहले चार-पांच विद्यार्थियों के लिए 2 बोर्ड हिंदी और इंग्लिश में लिखकर तैयार रखते थे ताकि समझाने के लिए ज्यादा वक्त बच जाए। फिर विषय की गहरी समझ और पढ़ाने की तल्लीनता ऐसी कि समय सीमा का अतिक्रमण हर रोज हो जाता था। उनकी इस आदत के कारण दर्शन-विभाग में प्रतिद्वंद्विता इस बात की होती थी कि आप 3 घंटे का क्लास लेंगे तो हम 4 घंटे का। फिर उनके विद्यार्थी हॉस्टल में आकर एक-दो घंटे के विश्राम के बाद ही जयपुर विश्वविद्यालय परिसर में स्थित उनके आवास की ओर चल देते थे। पौधों को जल से सिंचन करते हुए सर यह भी नहीं कहते थे कि अभी-अभी 4 घंटे तुम्हें पढ़ाकर लौटा हूं, थोड़ा विश्राम तो करने दो,अपने परिवार के साथ समय तो बिताने दो। वे तो किसी भी विषय पर बोलने में ऐसा मशगूल हो जाते थे कि गर्ल्स हॉस्टल लौटने का नियत समय-सीमा भी विस्मृत हो जाता था। अमेरिका के प्रसिद्ध येल यूनिवर्सिटी में 18 वर्षों के अध्यापन के अनुभव के बाद RU के VC ने उन्हें यहां सेवा देने हेतु राजी किया। घर की परिस्थितियां बहुत प्रतिकूल थी किंतु उनका दर्शन ज्ञानार्जन के लिए उतना ही अनुकूल था-" इतने गीत दे दिए तुमने सारे दर्द वसूल हो गए , तेरे दिए हुए पीड़ा के यह पल भी अनुकूल हो गए "- वे कहा करते थे कि भारतीय संस्कृति का सबसे पहला विषय दर्शन आज स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है और कॉलेजों में भी इसके पढ़ने वाले बहुत विरले मिलते हैं, इसी कारण से भारत जड़ से कटता जा रहा है और दृष्टिविहीन होता जा रहा है। विश्व के गिने-चुनेLogicians में उनका नाम अग्रगण्य था और दर्शनशास्त्र के सबसे बड़े पुरस्कार शंकर पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया था। मुझे तो एक बार उनसे घंटों बातें करने का सौभाग्य मिला लेकिन उनकी शिष्याओं के मुख से उनका नाम इतनी बार और इतना ज्यादा सुना कि " गुरु देवो भव " मंत्र का अर्थ समझ में आने लगा। उनकी श्रद्धांजलि में कहने को उनकी शिष्याओं के पास तत्काल रुप से आंसुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं था लेकिन उन दो बूंद आंसुओं का अर्थ मैं अनगिनत शब्दों में भी नहीं व्यक्त कर सकता। फिर भी कुछ धृष्टता मैंने की है क्योंकि उसी शिक्षक समुदाय से मेरा जीवन सौभाग्य से जुड़ गया है, जिस समुदाय में प्रो.(डा.)श्री विश्वंभर पाही सर जैसे सितारे पैदा होते हैं- सितारों को सितारों के हमेशा पास रहने दो , अरे आकाश तो आकाश है आकाश रहने दो ... 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ🙏🌹