अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उन घरेलू सामान्य महिलाओं का भी विशेष जिक्र होना चाहिए जिन्होंने अपने आत्मविश्वास, संघर्षशीलता और आशावादिता से अपने अस्तित्व का एहसास कराया है। 22 वर्षों से अपने घर खाना बनाने वाली बा जी की जीवटता का मैं साक्षी रहा हूं। व्यसनी और अत्याचारी पति से अलग होकर अपने दो छोटे बच्चों की परवरिश के लिए घर में खाना बनाने आईं। पैदल चलकर सुबह शाम 4 घरों में खाना बनाकर अपनी दाल-रोटी जुटाना और बच्चों को पढ़ाना उनकी दिनचर्या थी। किसी त्यौहार के अवसर पर मेले में जाकर स्वयं के बनाए पापड़ व खिलौने बेचकर कुछ अतिरिक्त आय अर्जित कर लेना उन्हें आता था। किंतु कई अवसर ऐसे भी आए कि सिर्फ बच्चों को खिलाकर वे स्वयं भूखी रह जाया करती थीं। बड़ा बेटा संदीप अपनी मां के साथ सारे छोटे-बड़े काम में हाथ बंटाता और छोटे भाई को पढ़ाने के लिए स्कूल भेजने में सहायता करता। संदीप की मातृभक्ति, सीखने की ललक और विनम्रता मेरे दिल को छू जाती। स्कूल जाने का अवसर नहीं मिलने पर भी धीमे-धीमे समाचार-पत्र को वह मेरे सामने पढ़ना सीख गया। किसी शादी-समारोह में खाना बनाने के लिए मौका मिलने पर वे कुछ ज्यादा पैसा कमा लेने का अवसर नहीं चूकतीं। व्यवहार कुशलता और दुनिया की समझ उनकी इतनी गहरी थी कि हम जैसों के सहयोग से प्लॉट खरीद कर मकान बनाने में सफल हो गई। किंतु छोटे बच्चे को लेकर विशेष चिंतित व परेशान रहती कि स्कूल में गलत संगति में पड़कर वह थोड़ा बिगड़ गया। बड़े बेटे को उन्होंने हुनरमंद बनाया और अच्छी शादी भी करा दी। इस बीच अपने मां-बाप के मरने पर संस्कार वगैरह की सारी रस्में पूरी तत्परता से निभाईं। अपने शराबी भाई के इलाज के लिए भी उन्होंने बहुत संघर्ष किया लेकिन उसे बचा नहीं सकीं। छोटे बेटे ने अंतरजातीय विवाह किया तो उस समस्या को बड़ी बुद्धिमता और समझदारी से हल किया। पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद भी उनकी जागरूकता,व्यवहारिकता और कर्मठता देखकर मैं बहुत कुछ सीखता हूं-" हर मौसम में नीरव और निश्चिंत रहना , वसंत की नदी की भांति मंद-मंद बहना" - यह संदेश मुझे उनके जीवन से हर पल मिलता रहता है। इस पितृसत्तात्मक समाज में स्वतंत्र होकर अपने बच्चों को पाल लेना और अपनी कला से एक-एक तिनका जोड़ कर अपना आशियाना बना लेना कोई आसान काम नहीं है और उससे भी बड़ी बात कि तीन बच्चियों ने घर में जन्म लिया लेकिन सबके जन्मदिवस की खुशी मनाना और उन्हें स्कूल भेजने के काम को उन्होंने इतने अच्छे तरीके से किया है कि मैं नतमस्तक हो जाता हूं। किताबों में बहुत पढ़ा किंतु महिला सशक्तिकरण का अर्थ तो मुझे बा जी के जीवन-दर्शन ने समझा दिया। बड़े पदों पर पहुंची महिलाओं का जिक्र बार-बार होता है किंतु परिवार और समाज की बेरुखी के बीच शराबी पुरुषों से दूरी बनाकर स्वयं के बलबूते से अपनी जिंदगी को कांटो के बीच फूल की तरह खिलाकर बा जी जैसी महिलाओं ने एक नई आशा की किरण जगाई है।'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹