एक रंग मांगा था तुमने सुरधनु का उपहार दे दिया , एक रुप मांगा था तुमने यह सारा संसार दे दिया- प्रिज्म से गुजरने पर सफेद रंग सात रंगों में प्रकट होता है,उसी प्रकार प्रेम से गुजरने पर यह संसार रंगीन हो जाता है। परमात्मा ने इतनी रंग-बिरंगी और खूबसूरत प्रकृति बनाई कि इन आंखों को विश्वास नहीं होता। होली का पर्व उस विश्वास को एक आधार देता है। तभी तो हम रंगों के इतने दीवाने हो जाते हैं कि हर कोई हर रंग में रंगने को बेताब दिखता है। दुर्भाग्य है कि हम सिर्फ बाहरी रंगों से रंगना पसंद करते हैं जबकि प्रेम के विकसित होने पर हृदय इतना रंगीन हो जाता है कि पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षियों तक से प्रेम हो जाता है;मानवता के प्रति उसके लगाव का तो कहना ही क्या! नासमझी के कारण पेड़ की डालियों को काटकर हम होलिका दहन मना लेते हैं ;पशु-पंक्षियों के आशियाने उजाड़ कर पत्थर के मकान बना कर खुश हो लेते हैं।फिर हमारा दिल भी पत्थर का हो जाता है जो कृत्रिम केमिकल रंगों से ही रंगने में कृत्रिम खुशी प्रकट करता है। हमारे गुरुकुल वनों में होते थे, जहां विभिन्न प्रकार के फूल खिलते थे और कई प्रकार के पशु-पंछी साथ रहते थे।फिर मानव के साथ रहना तो स्वर्गिक सुख के समान होता था। काश!होली का पर्व रंग-बिरंगे फूलों पर मडराने वाली रंग-बिरंगी तितलियों की याद दिला दे-" फूल के होठों पर तितली को बिठाकर , चाहत का सलीका भी सिखाया जाए । अब मजहब नया कोई बनाया जाए , इंसान की अस्मत को बचाया जाए।। "- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे होली की शुभकामनाओं के साथ🙏🌹