फांसीऔर फांसी में फर्क कितना?
March 23, 2020शहीद दिवस "फांसीऔर फांसी में फर्क कितना?" -23 मार्च1931के दिन भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को शाम के वक्त फांसी की सजा हुई किंतु वह शाम भारत में एक नई सुबह लेकर आई। निर्भया के दरिंदों को 20 मार्च को सुबह में फांसी की सजा दी गई किंतु इस सुबह ने मानव मन के कई अंधेरे पहलू को उजागर कर दिया। एक तरफ आजादी के दीवानों ने अपने महान मकसद के लिए कितने कष्टों को हंसते-हंसते झेला-' उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नया तर्जे जफ़ा क्या है , हमें यह शौक है कि देखें सितम की इंतहा क्या है' - युवा भगत सिंह के ये अल्फाज आज भी वतन की बेहतरी के लिए मर मिटने को प्रेरित करते हैं। दूसरी तरफ अपनी अमानवीय काली करतूतों की सजा के डर से फांसी से बचने हेतु कितने प्रकार के हथकंडे अपनाए गए। हर मोड़ पर मौत दस्तक देती और हर मोड़ पर नए बहाने बना लिए जाते। अंततः मौत हुई लेकिन इसके पहले अनगिनत बार अपने कुकर्मों के कारण वे पल-पल मरते रहे। इधर फांसी के फंदे को चूम कर अपने विचार और आचार के कारण वे बलिदानी सदा-सदा के लिए अमर हो गए-' हवाओं में रहेगी मेरे ख्यालों की बिजली , ये मुश्ते खाक है फानी रहे ना रहे' . उनके परिवार ,संस्कार,शिक्षा और विचार सब पर गहराई से सोचने का यह दिन है। एक जवानी ऐसी है जिसकी मौत पर पूरा हिंदुस्तान कुर्बान हो जाता है और दूसरी जवानी कैसी है , जिस पर मानवता शर्मसार हो जाती है। ' इतना बड़ा अंतर कैसे? '- प्रश्न पर विचार करने में मस्तिष्क उलझा हुआ है किंतु हृदय अपने युवा क्रांतिकारियों को हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करने में गर्व की अनुभूति कर रहा है-' जवानी हो तो ऐसी '. 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹